Wednesday, 31 December 2014









कलाई में बंधी गिरह जल गई थी,

राख गले पे रख दहकते शोले निगल लिए थे,

अपनी बाहों से उतार

बीती रात रख छोड़ी है उँगलियों में लिपटी नफरत तुम्हारे सिरहाने,

मैं भस्म हो चुकी

तुम इसे ओढ़ पाये तो जी उठोगे.


किसी एक पल में होता है

सब कुछ सोच चुकने के बाद का खालीपन

और

उसी एक पल में तुम्हारी बातें, कहकहे, उदासियाँ,

और

अधखुले, कपकपाते

तुम्हारे नाम की गिरह कसते

अधर

उसी एक पल में समाया होता है

सब कुछ.................सब कुछ ...

Monday, 29 December 2014



ये एक प्रेम पत्र हो सकता है / था।




है या नहीं इसे तय करने का अधिकार हमारे सिवा बाकी सभी ने खुद को दे रखा है।










लोग कहते हैं की मैं तुम्हारे प्रेम में हूँ , किसी ने मुझसे पूछा की क्या इस रिश्ते के लिए मैंने कोई सीमा तय की है ? तो सिर्फ इतना ही जवाब दिया मैंने की नहीं मेरे प्रिय के लिए किसी तरह की कोई सीमा नहीं,

कोई कहता है की तुम्हारे प्रति मेरा लगाव साफ़ दिखता है मैं इसे स्वीकार करू या नहीं , तो बताओ तो भला मैंने कब इनकार किया की लगाव नहीं है ,
सुखद है ये सुनना की मेरे लिखे हर लफ्ज़ में से , मेरे रचे हर चित्र में से तुम झांकते हो , तुम्हारा अहसास है ,
लेकिन
मैंने ये भी तो कहा न की तुम्हे नहीं आना है कभी लौटकर मुझ तक ,
मैंने ऐसी कोई राह बनाई ही नहीं की तुम आ सको मुझ तक,
हम दो किनारों पर साथ चलते हुए भले एक दूसरे को देख कर हाथ हिला दें और मुस्कुरा दें ,
इससे बड़ा उपहार ज़िन्दगी हमें दे नहीं सकती थी,
हाथ में पकड़ी परछाई को नाम मिले न मिले नाक-नक्श मिल जाए तो और कुछ सर झुका कर माँगने को रह नहीं जाता,

इन बातों को करते हुए हम खिलखिला उठते हैं, दबी सांस के साथ काश कहते हुए।

एक ख़त है तुम्हारे लिए, अक्सर सोचा है की ड्रावर में पड़े रहने की बजाय इसे तुम तक पहुँच जाना चाहिए , किसी दिन अगर तुम ये ख़त पढ़ सको तो क्या होगा तुम्हारा जवाब , उस ख़त का जवाब भी तो ये ख़त ही है , है न।








तुम मेरा विश्वास हो

तुम गए सब गया

Tuesday, 23 December 2014



एक ख्वाब था सादा सा

न आँखें थी न बातें थी न ही अर्ज़ियाँ थी,

न शब्द न ताने न उल्हाने

न पते थे न चिट्ठियाँ

और

न ही था इंतज़ार,




उन्ही भले दिनों में

सीपियों पर चलता लड़का

बेहद खुश था,
उसने सराब की कुछ बूदें
लड़की के प्यासे होंठों पर रख दी
दिशाहारा लड़की हँसती रही,
हँसती गई आबशार सी
और
डूब गई।

सपनो पर गिरहें बाँधते लड़के की जेब में
आज भी
पानी की बूँदें एक रेज़गारी सी खनकती हैं

*********************

सराब ----मृगतृष्ण
आबशार----झरना
दिशाहारा- दिग्भ्रमित

Sunday, 14 December 2014



ख्वाब में देखे ख्वाब उंगली में लिपटे रह जाते हैं और बेहद टीसते हैं


ऊँगली से लिपटे ख्वाब रंग बदल देते हैं उँगलियों का, गहरा नीला , इस नीले रंग में मिला होता है एक शांत मुस्कराहट, मीठी सी टीस और एक सुखद अहसास का रंग भी और तब ज़िन्दगी खूबसूरत लगती है.





बड़े बड़े काँटों के बीच से चुनना बिखरे आधे और कुछ पूरे फूल। उन्ही के बीच कुछ सूखे फूल मिलना , वाकई ज़िन्दगी खूबसूरत है।




जब स्कूल में थी तो वॉयलिन सीखना चाहती थी शायद इसलिए की उस समय जितनी भी किताबें पढ़ती थी लगभग उन सभी के नायक वॉयलिन बजाया करते थे लेकिन सीखा सितार. शायद माँ की चाहना होगी. शाम के वक़्त जब सितार बजता तो माँ की शांत आँखें देख लगता ज़िन्दगी खूबसूरत है




आज सब कुछ पीछे छोड़ के मन करता है कंधे पे पिट्ठू टांगू और चल दूं कहीं को भी. तयशुदा मंजिलें कभी भी मुझे अपनी और नहीं खींचती . आँखें बंद कर के जब सफ़र पे निकलती हूँ तो खुद को गर्म दोपहर में सुनसान कच्चे रस्ते पे पाँव -पाँव चलते हुए देखती हूँ. लेकिन हर बार की तरह इस बार भी ये सफ़र तब तक के लिए मुल्तवी कर देती हूँ जब तक बेटा बड़ा नहीं हो जाता. बेटा कहता है की आपका मन है तो चली जाओ, कोई भी प्रॉब्लम आती है तो अपने साथ सोल्यूशन ले के आती है बस उस छिपे हुए सोल्यूशन को खोजना होता है. जब आप नहीं रहोगी तो मैं अपने सारे काम खुद करना सीख ही लूँगा. उसका ये कहना की जब आप नहीं रहोगी मुझे हुलसा देता है. उसे खुद में रमे देखती हूँ तो लगता है की ज़िन्दगी खूबसूरत है.




ज़िन्दगी तब भी बेहद खूबसूरत थी जब मेरे पास वैसी कोई प्रेम कहानी नहीं हुआ करती थी जैसी स्कूल में कुछ एक लड़कियों के पास हुआ करती थी. स्कूल के पीछे की दीवार कूद कर आया लड़का जब डंडा बजाते चौकीदार के डर से वापस भाग जाता और उसकी वो प्रेयसी हम चार-पाँच लड़कियों के बनाये घेरे में खड़ी गालों पे अंकित उस प्रेम निशानी को सहेज रही होती तो मुझे हैरत होती थी. आज भी अपना वो हैरतज़दा चेहरा देख पाती हूँ उस गोल घेरे के बाहर  खड़ी हो कर. लेकिन आज तक भी ये नहीं समझ पाई की हैरत किस बात की हुआ करती थी. उम्र के उस मोड़ पर उस प्रेम कहानी के रोमांच को समझने में सर खपाने से बेहतर लगता की रसोई में गैस के पास बैठ कर जल्द से जल्द श्रीकांत खत्म की जाए. कुछ बातें , कुछ हैरतें सिर्फ और सिर्फ अपनी होती हैं, लहू-मांस की तरह. जिन्हें किसी से भी साझा नहीं किया जा सकता , कभी-कभी खुद से भी नहीं. पिछली उम्र जब आज दौड़ कर उँगली थाम लेती है तो लगता है

ज़िन्दगी खूबसूरत है.

https://www.youtube.com/watch?v=kowARsNeMqo



Lambi Judaai - Reshma - LIVE
इस गीत को सुनते हुए न तो उदासी तारी होती है और न ही तुमसे दूरी का अहसास होता है। इसे सुनते हुए डूब जाती हूँ तुम में। तुम्हारे कंधे से लगी सुनती हूँ तुम्हारी आवाज़। गहरी ,धीमी आवाज़ ,तुमने सुनी है कभी अपनी आवाज़ ,मुझसे बात करते हुए, कितनी खामोश और मुझ तक पहुँचने को आतुर।अचानक ही बेहद धीमे स्वर में बोलने लगते हों शायद इसलिए की मेरी आँखों में खुद कों देखना चाहते हो। खुल के रह गई पायल को उठाते हो और मेरी फैली हथेली की बजाय जेब में रख लेते हो। हमारे बीच कभी किसी सवाल के लिए जगह नहीं रही।


ज़िन्दगी खूबसूरत है, है न!

























तुम्हारे सीने पे रख ख्वाब उठाया तो रेशम-रेशम फिसलती सांस आधी आँखों में अटक कर रह गई.





इस सर्द रात दालान की सीढ़ियों पर
तुम्हारे साथ बैठना
जगती सुबह जब उठने लगेगा कुहरा
तो
बचे रह जायेंगे
मेरी गर्दन के इर्द गिर्द इत्र से तुम्हारे शब्द
















******************** **********************
















अलाव के सामने
तुम्हारे काँधे से लगी सुनती हूँ तुम्हे
घुल जाते हैं मीठे खजूर से तुम्हारे शब्द
पहुँचती है सिर्फ तुम्हारी आवाज़ मुझ तक
गहरी धीमी आवाज़
तुम देखते हो मेरे हिलते कुंडल को
और
मैं देखती हूँ तुम्हे
ये आज की ही बात है
या
है रोज़ की

Friday, 12 December 2014



रहिये अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो !

हम सुखन कोई न हो , और हम जुबाँ कोई न हो !!




चली आई हूँ ऐसे ही एक शहर में जहाँ कुछ भी जाना पहचाना  नहीं दिखता. न सड़के, न पेड़, और न सड़क किनारे पसरी हुई ये बेंच ही । किसी में कोई कौतुहल नहीं मुझे जानने का, मुझ से जान पहचान बढाने का । मुझे भी कोई इच्छा ,कोई जिज्ञासा नहीं होती की उन्हें जान लूँ , एक बार छू लूँ । मुझे इस शहर में रहना ही है ये शहर जगह दे या न दे । मज़बूरी है इस शहर की भी और मेरी भी। शहर कभी किसी को बेदखल नहीं करते.इस शहर ने एक उदासीन दोस्त की तरह मुझे थोड़ी जगह दे दी . यहाँ की हर चीज़ पे एक ठण्ड सी जमी है। सब कुछ अपनी गति से होता हुआ, चलता हुआ मेरे आगे से गुज़रता जाता है और मैं हाथ बढ़ा कर उसे थामना भी नहीं चाहती। इस अजाने शहर की एक सड़क पर आ खड़ी होती हूँ। यहाँ हर चीज़ है , खूबसूरत पत्तियों वाले पेड़, बच्चों की खिलखिलाती हंसी, एक दूसरे में डूबे चेहरे, सब कुछ तो है जो हम अपने आस-पास देखना चाहते हैं. बातें हैं, हवा में ऐसी सुगंध है की सांस भर ली जाए फेफड़ों में । सब कुछ खूबसूरत । उसी शहर की उसी सड़क पर चलते हुए लगता है सड़क के आखिरी हिस्से पे आ गई हूँ । एक चेहरा दिखता है मेरी ओर  देखता हुआ । पहचान की एक भी रेखा नहीं उभरती उस चेहरे पर. नाक तीखी है या गोल समझ नहीं आता। जानने के लिए हाथ बढ़ाती हूँ तो हाथ हवा में झूल जाता है। वो अपरिचित सा चेहरा हर हाथ, हर ऊँगली की ज़द से बाहर है। पतले -पतले होंठ स्नेहसिक्त मुस्कराहट की एक महीन सी रेखा में पगे हैं. । उन होंठों की तरफ बढ़ती उँगलियों की छुअन में अपने ही होंठों को महसूस करती हूँ । पतले होंठों पे उंगलियाँ फिराते उठ कर बैठ जाती हूँ। वाकई में बैठी हूँ या सपने में उठ गई हूँ पता नहीं चलता। उस जगह हूँ जहाँ ख्वाब और हकीकत आपस में मिल जाते हैं और खूबसूरत सा सच अँजुरी में भर देते हैं की जीना और मरना दोनों गिरवी रख दिए गए हैं। जिए तो कोई किस तरह जिए और मरे तो कोई क्यों मरे।एक याद को खिसका कर दूसरी याद के लिए जगह बनाने की कोशिश करती हूँ फिर भी उन्हें आपस में रलने मिलने से रोक नहीं पाती। वो जगहें तो याद आती हैं जहाँ कुछ यादो के पते मिल जाया करते थे लेकिन अब सड़कों के नाम पते भूलने लगी हूँ। उसकी तरफ कदम बढ़ाते उसे देखती भी रहती हूँ बस पहचानने की कोई कोशिश नहीं करती. भूरा सा कोट जिस पर आड़ी तिरछी काली लाइने हैं, बालों से लगता है उसे यहाँ खड़े एक उम्र गुज़र गई होगी लेकिन उस गुजरी उम्र ने चेहरे पे जाने क्यूँ कोई निशान नहीं छोड़ा. उसने कितने बरस इस सड़क पर बिठाये होंगे कहना मुश्किल है. उसके पैरो को देखने की कोशिश में कभी चमकती रेत दिखती है तो कभी कूटी हुई रोड़ियाँ . एक भरम उसके पैरों , उसके पीछे छूटे सालों को ढक रखता है. उस सड़क के आखिरी छोर पर खड़े उस आदमी ने न कुछ सुनाना चाहा न किसी अचरज को कोई जगह ही दी. पीली गुनगुनी धूप का जब समय हुआ तब उस ने मेरी बाहों में रसभेरियां भर दी। मैं उसकी तरफ देखना चाहती थी लेकिन निगाहें कहीं दूर उसे पार करते हुए देख रही थी। उससे कुछ कहना चाहती थी लेकिन होंठों ने मुस्कुरा के बस गर्दन हिला दी।वक़्त रेत घड़ी था फिर भी ठहरा हुआ, जैसे जो वो देने आया था वो मुझे मिलना ही था। रसभेरियां मेरे सपनो सी खट्टी और तुम्हारे शब्दों सी मीठी थी.। इन्हें बाँहों में लेते खूब जोर से साँस खींची और सीने में तुम्हारी महक भर गई. इन रसभेरियों का क्या करू नहीं जानती। इन्हें इसी अजाने शहर की किसी, सपनो को सुई धागे से सिलती लड़की, के लिए गहरे दबा दूं या अपने साथ ले आऊँ जब भी लौटुं इस शहर से.




ख्वाब में देखे ख्वाब उंगली में लिपटे रह जाते हैं और बेहद टीसते हैं।

Thursday, 11 December 2014

एक धसका सा उठा   .....






शिलॉंग छोड़े हुए पूरे दो साल हो गए. इन दो सालो में  न याद करते हुए भी शिलॉंग  बेहद याद आया . कभी अनजाने से रहे उस शहर को बहुत सारे मोड़ों पर खड़ा पाया. किसी शहर को हम अक्सर वहां के लोगों के साथ बिताये  वक़्त के लिए याद करते हैं  लेकिन मैंने शिलॉंग  को अपने अनदेखे सपने और कुछ अचानक में पूरे हुए सपनो के लिए याद किया है या यूँ कहिये की चाहा है .2010   में जब बॉम्बे छोड़ के शिलॉंग जाना पड़ा  था तो हर सूरत उदासी हुई थी. बॉम्बे की सरल और मस्त ज़िन्दगी के बाद शिलॉंग ? पता नहीं कैसा होगा.  कितनी ऐसी जगहें होंगी जहाँ मैं बीत चुके और आने वाले सारे मौसमों को पी सकुंगी? लोग कैसे होंगे इसकी फ़िक्र कभी नहीं रही. फ़िक्र रही तो दौड़ते रास्तों और टिमटिमाती रौशनियों और चुप पड़ी बेंचों की.  बॉम्बे की सड़के  बॉम्बे की शौपिंग बॉम्बे का मौसम , लोकल ट्रेन में दौड़ के चढ़ना  और फिर खूब हँसना, जब कुछ करने में मन न लगे तो किसी लोकल ट्रेन में पहले स्टेशन से आखिरी स्टेशन तक आते जाते रहना . ये सब कहाँ मिलने वाला था शिलॉंग  में .शिलॉंग  अपनी पूरी खूबसूरती के साथ मेरा स्वागत करने के लिए तैयार था लेकिन मैं तो माथे पे शिकने डाले उससे लड़ने को तैयार रहती थी. अक्सर सबसे खूबसूरत और मासूम  वही प्रेम कहानियाँ होती है जिनकी बुनियाद  में ढेर सी पहली मुलाक़ात की लडाइयां होती हैं.पुरानी होती लड़ाइयों के साथ मैंने और शिलॉंग  ने दोस्ती कर ली. शिलॉंग  की पतली संकरी  गलियों में घूमना , बिना गिनती किये कभी हँस-हँस कर दोहरे होते हुए   और कभी घुटनों पर हाथ रख हाँफते हुए  सीढियाँ चढ़ना ,  हर घर में फिर वो किसी चौड़ी सी सड़क किनारे हो या किसी जंगल के बीच छुपा सा हो सबमें  बेहिसाब खिड़कियाँ होती,  ढेर सारी खिडकियों वाले उन  घरों को निहारना , हर खिड़की पर जालीदार परदे,  लगता था जैसे धूप के साथ- साथ सपनो को भी आने की पूरी छूट  है. सपनो के चले आने पर किसी की कोई रोक नहीं है लेकिन उन्हें पूरा करना कई बार बस यूँ ही बिना किसी वजह के मुल्तवी करना पड़ता है. व्यू पॉइंट से नीचे एक रास्ता जाता था, उबड़-खाबड़ सा , जंगलों से होता हुआ कच्चा  सा रास्ता जो शहर में बने एक बड़े से घर के बगल में निकलता था. कई बार सोचा की अब जब भी शहर जाने का मन होगा तो उसी रस्ते से जाउंगी पैरों पैरों , झाड़ियों के बीच बनी पगडंडियों पर उछलते -कूदते , काँटों से बचते  नीचे उतरूंगी. लेकिन पूरे दो , नहीं ढाई साल सोचती ही रह गई. पता नहीं कभी जा क्यूँ नहीं पाई उस रस्ते पर. कितनी बार तो ऐसा होता है न की हम बीच सड़क पर खड़े होते हैं और तय नहीं कर पाते की दाएँ मुड़ा जाए या बाएँ. और हम किसी तरफ नहीं मुड़ते बस सीधी राह चल पड़ते हैं. फिर भी मुड़ -मुड़  कर उन मोड़ों को देखना नहीं भूलते. मुझे शायरा ने कई बार कहा की मैडम चलिए मैं आपके साथ चलती हूँ वापस उसी रस्ते से नहीं आयेंगे टैक्सी करके आ जायेंगे. जिस रस्ते को देखने की इच्छा थी उस पर चलने के लिए साथ भी मिल रहा था फिर भी पता नहीं क्यूँ  नहीं गई. बहुतसारी  पीछे छोड़ दी गई बातों की कोई वजह नहीं होती , कितना भी सोच लो कोई वजह नहीं दिखती. बस यूँ ही ...... कह कर छोड़ देना होता है. अब जब जोधपुर से जाने का समय हो गया है तो शिलॉंग  याद आ रहा है . कितनी अजीब सी बात है किसी से दूर जाते हुए कोई और याद आ जाता है. जबकि दोनों में कोई समानता भी नहीं.  जैसे कोई फोटो देखते हुए उससे जुड़े किस्से बातें याद आ जाती हैं और फोटो थामे हाथ नीचे हो जाता है और आँखें किसी और समय किसी और पल की फिल्म से गुजरने लगती है.अभी सामान बंधना शुरू नहीं हुआ  फिर भी सोच रही हूँ की इस शहर से क्या ले के जाउंगी साथ. एक गहरी उदासी जो हर शहर के साथ चली आती है. इस शहर की कोई ऐसी सड़क नहीं जो आँख मूंदते ही सामने आ खड़ी हो. ऊपर को जाती हुई शिलॉंग  की सड़क का वो मोड़ जहाँ बिना पलक झपकाए किसी का इंतज़ार किया था, शहर से बाहर की तरफ बना वो रिजोर्ट जिसकी सीढ़ियों पर बैठ कॉफ़ी की चुस्कियां  ली गई थी बीते दिनों का हाल पीते हुए. 
हम अलग अलग लोगो से मिलते हैं और हर मिलना एक याद बन जाता है,   और कोई दो याद को एक जैसा नहीं कह सकते . एक याद हमेशा ही थोड़ी ज्यादा करीब लगती है.  शिलॉंग के बड़े से ताल के किनारे गोल-गोल घूमती सड़क पर चलते हुए , कोलम्बस को याद करते हुए उस ताल  का अपने भीतर उतरना. कितने निशान , कितनी तो उदासियाँ और एक मोहब्बत , कहाँ तक याद करे कोई.  अब किसी नए शहर में बसते हुए , फिर से एक बार गलियों , सड़कों के चेहरे पहचानते हुए  उस शहर को अपना परिचय देना नहीं सुहाता. जोधपुर से तो इतना भी परिचय न हुआ की ये सड़क कहाँ जाती है. इसमें जोधपुर का क्या दोष. और मेरा भी क्या दोष जो इससे मोहब्बत न हो सकी. शिलॉंग में गहरे हुए महबूब के क़दमों  के निशान जोधपुर तक नहीं आ पाए.  आज अचानक एक धसका सा उठा जिसे बीच में ही  दो धुंधले से हाथों  ने थाम लिया. 










 

 

रहिये अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो !

हम सुखन कोई न हो , और हम जुबाँ  कोई न हो !!!






Monday, 8 December 2014

खुली आँखों से जिया तुम्हारे साथ का एक खुश लम्हा...





तुम्हारे थोडा सा पीछे अधलेटी सी हूँ  और तुम पढ़ रहे हो कोई किताब , कोई कहानी कोई उपन्यास या कुछ और  बस पढ़ रहे हो और पढ़ते-पढ़ते जो अच्छा लगता है तुम सुनाते  हो मुझे , बीच -बीच में हाथ से टहोक देते हो  "सुन रही हो न " , मेरी एक छोटी सी ह म्म से आश्वस्त हो जाते हो , तिलिस्म से  जागते हैं तुम्हारे शब्द , जागती आँखों से देखते हुए ख्वाब से एक और ख्वाब में तैर जाती हूँ , बदन पर पड़े हुए तिल  की तरह उग आती है तुम्हारी आवाज़ और नाभि के भंवर से होती हुई लहू में घुल जाती है , अच्छा लगता है तुम्हारी आवाज़ में अतीत की किसी याद , किसी समर्पण , किसी बिछोह की कहानी सुनना , अच्छा लगता है तुम्हारी आवाज़ सुनना , जहाँ बैठी हूँ वहां से तुम्हारी पीठ दिखती है मन करता है हाथ रख दूं , दिखती है तुम्हारी गर्दन , तुम्हारे बाल , कभी मन क्यों नहीं किया तुम्हारे बालों  में उंगलियाँ फिराने का आश्चर्यचकित हूँ , गर्दन पर दिखता  है एक तिल जैसे संभाल रखा हो स्पर्श कोई पुराना , तुम मुड़ते हो और मुझे आँखें बंद किया हुआ पाते हो , जब भी सोचती हूँ तुम्हे आँखें अन्दर की तरफ खुल जाती हैं , तुम धीरे से मेरे सर के नीचे का तकिया ठीक करते हो मुझे आराम से लिटाने के   लिए और रख देते हो किताब वहीँ सिरहाने , मेरे सुने बिना तुम्हे भी कहाँ अच्छा  लगता है पढना .


कभी- कभी सोचता हूँ.......




मोतियों जैसी खनकती तुम्हारी हँसी

के ग़ुम होने का दोष किसे दूँ।




प्रेम झील सी गहरी आँखें
जो किसी के
दिल से ज्यादा गहरी थीं
उस झील के सूख जाने का
दोष किसे दूँ।

खामोश पलकों से मुस्कुराने को बाध्य
ऊपरी होंठों के सिकुड़ते आयाम
का दोष किसे दूँ।

अल्हड बलखाती ठुमक चाल के
सीधे हो जाने का दोष किसे दूँ।

गुनगुनाती हँसी से किसी को भी
आदेश देने की स्वतन्त्रता
संभल कर बोलने लगी
तो
दोष किसे दूँ।

अब भी
कभी- कभी सोचता हूँ...

Saturday, 29 November 2014


 https://www.youtube.com/watch?v=4zTFzMPWGLs&spfreload=10





इस उदास आवाज़ को सुन तुम्हारे गले के पास गहरी साँस लेते हुए तुम्हे और और कस कर पकड़ लेती हूँ तब तुम बेतरह याद आते हो.







इस उदास गीत के साए में तुम मुझे कंधो से पकड़ खुद में समेट लेते हो और तब तुम याद आते हो बेहिसाब.










एक ठंडी सुबह रेलवे स्टेशन की सबसे आखिरी सीढ़ी के पास सारी शैतानियाँ भूल खड़ी हूँ . जाने तुम्हे लेने आई हूँ या विदा करने. तुम्हारे ऊपर चढ़ते कदमों की आवाज़ नहीं आती न ही तुम्हारी पीठ दिखाई देती है. तारीख़ बरस दर बरस वही रहती है बस अपनी नियत जगह पर नहीं होती. लेकिन न तो मुझे तुम्हारे जाते हुए कदम दिखते है और न ही सीढ़ियों से उतरता पास आता चेहरा और तुम मुझे अधिक याद आते हो .










तुम्हारे शब्द, तुम्हारी आवाज़, तुम्हारी मुस्कराहट, तुम्हारा स्पर्श, कुछ भी तो याद नहीं बस तुम याद रह गए हो. मेरी याद का हर टुकड़ा छीज़ गया है .तुम्हारा हाथ पकड़ धीमे चलते हुए बरसाती का दरवाज़ा खोलती हूँ और तुम्हे देख पाती हूँ मोमबत्ती की रौशनी में बैठे हुए , तक रहे होते हो मेरा रास्ता छत के किनारे से टप- टप गिरती पानी की एक धार में . रंगीन कांच से उन छनकती बूंदों को देखते हुए तुम बहुत याद आते हो.










तुम्हारी किताबें समेटती हूँ तो अपनी गोदी में रखी किताब तुम मेरे हाथों में रख देते हो. मोमबत्ती उठा के मेरे चेहरे के एकदम पास ले आते हो, जूड़्रा फिसलते हुए खुलने लगता है और तुम अपनी शॉल में मुझे लपेट लेते हो. मुट्ठियों में पकड़ी उस काली शॉल में बेतरह याद आते हो तुम.







हमेशा ऐसे ही रहना







https://www.youtube.com/watch?v=4zTFzMPWGLs&spfreload=10

Friday, 28 November 2014


बीते हुए सालों की धसका सी एक याद







तुम्हारी तरफ कॉफ़ी का मग बढाती हूँ और तुम बिना किताब पर से निगाह हटाये हाथ आगे बढ़ा देते हो । मैं मुस्कराहट होंठों में दबाये दो कदम पीछे हट जाती हूँ। हवा में तलाशते तुम्हारे हाथ से जब कुछ नहीं छूता तब तुम्हारी नज़रें उठ जाती हैं मेरी आवाज़ के पीछे पीछे। मेरे चेहरे पे मुस्कराहट देख तुम झल्ला जाते हो, मुझे अपनी पहुँच में ना पा कर या मुझे देखने के लिए तुम्हे अपनी नज़रें उठानी पड़ी इसलिए।

तुम्हे भी आदत है और मुझे भी बिना एक दूसरे की आँखों की ज़द में आये एक दूसरे को देखने की।

आज जब उठ आई हूँ तुम्हारे पास से तब ये अहसास हुआ कि हम कभी अगल बगल क्यों नहीं बैठते .




ज्यादा रुचता है हमें एक दूजे केे सामने बैठ कर एक दूजे को पढ़ना।



तुम यूँ ही रहना हमेशा .
सारी दुआओं को ताबीज़ में बाँध
माथे पर भभूत मल
बैठी है वो आखिरी द्वार पर
बिसात बिछा
दाँव पर है
उसके सारे भ्रम
और उनसे मिलते जुलते यकीन
गिरते हर पासे  पर
ईश्वर की मुस्कराहट देख
रख लिया है उसने
ख़्वाबों को आँखों से निकाल
सोच में
अटका लिए  हैं कहकहे हलक में
अंगूठे की पीठ पर उलझी रेखाओं में
एक नाम
सुलझाने की
चाहना के साथ।
शब्दों में बोलते हो तुम
ठहाके बगल में रख हँसते हो
कैसे जीते हो तुम
सुबह की चाय
गूँद की छावँ में
एक दूसरे को पढ़ते हुए
आओ
जीना सीखते हैं
पढ़ो एक दुआ
आज
मेरे हक़ में
कि
"कभी कुछ न बदले"
यूँ हीं मेरी चिट्ठियां गीली स्याही लिए अपना रंग खोती रहें,
आवाज़ें खँगालती  रहे तुम्हारे पदचिन्हों से बनी दिशाएं,
न पूरा न अधूरा
कोई लम्हा न बटें कभी दो हिस्सों में,
" कभी कुछ ना बदले"
दो अलग शहरों में बसे
एक ही रस्ते पर खड़े हो
कहें
भूली हुई ज़बान में
साथ-साथ
आमीन !!!


सीधी सड़क से गुजरते एक मोड़ पर खड़ी हूँ

तुम्हे तलाशते तुम्हारे शहर पहुंची हूँ

किस राह जाऊं ?

इस शहर के बीत चुके मुस्कुराते नजारे,

सामने खड़े हैं

सीधी नीरव राह से गुजरता

पुल से उतरता

कभी मेरा रहा शहर

अब जो तुम्हारा है सिर्फ

मेरे साथ-साथ ये भी

काफी बदल सा गया है
तुम्हे याद न करने की सारी जुगत लगाती हूँ
बेतरह हँसती हूँ इधर-उधर से इक्कठे किये छोटे छोटे टुकड़ों पर

इक्कड़ दुक्कड़ खेलती हूँ
एक टांग पर कूदते हुए
शायद किसी जादू से
जिस अगले खाने में पहुँचूँ वो तुम्हारा मन हो

एक आँख मीच कंचे पर जब लगाऊँ निशाना
तो वो उछलता हुआ जा लगे 
धूप सेंकती तुम्हारी पीठ पर
और
तुम ना चाहते हुए भी मेरी तरफ किसी जादू के जोर से घूम जाओ

जादू होने की उम्मीद होना अच्छी बात है
एक दिन सब ठीक हो जायेगा इस उम्मीद की उम्मीद होना भी अच्छी बात है

सारे जादूगर निकालते हैं कान से पकड़ खरगोश को टोपी से
उस खरगोश को वापस टोपी में ग़ुम करना सिर्फ तुम्हे आता है।

Monday, 10 November 2014



तुम्हारी आकाशगंगा से परे

उस एक अकेले तारे का टिमटिमाना

क्या बाँध पाता है तुम्हारी नज़रों को

जब टूट कर गिरे वो

तो

मांग लेना एक ख्वाहिश

पढ़ना दुआ

और

पीठ फेर खड़े हो जाना।


आमीन।













Saturday, 8 November 2014



जब तुम्हे दोराहे पर पा ठिठक जाऊँ,

जाता देखूँ जब तुम्हे किसी राह

तब भी,

तुम्हारी पीठ पर रक्खी आँखों में

सुकून भर पाऊँ,

जब पलकें हों खामोश

और होंठों पर ज़िंदा न हो कोई कम्पन,

तो समझना

तुम्हारी आत्मा की धड़कन में

साबुत बची हूँ मैं।


मोहब्बत में डूबी

आँखों को रंग देने

किसी अजाने काल में

फूट था एक ज्वालामुखी,

मारू ने रक्खी थी कुछ नसीहतें

हथेली पर,

हीर ने कच्ची मिटटी से बना

बाँधा था ताबीज़ तुम्हारे गले में,

आज इस वक़्त

उस ताबीज़ को चूमते हुए
चाहना है
पीठ मिला खड़े
इकलौते और अंतिम सच को एक करने की।


जब

कह उठती हूँ

कि

कोई आहट हो की पलकें झपकें और

सूख जाएँ आँखें

तो

तुम अपनी रेखाओं में लिख लेते हो

मेरा इंतज़ार,

जब लिखती हूँ

स्वयं की खोज में पहुंची हूँ तुम तक
तो
बाँहों में भर लेते हो
मेरे इस तय किये हुए फासले को,
तानो उलाहनों की बंदिश में पगी
बेसब्री और इंतज़ार भरी
पुकार सुन
बिना मुड़े
समझ लेते हो मेरा प्रेम
जानती हूँ मैं।

Monday, 3 November 2014


अक्षरों को जीती
थम गई थी उंगलियाँ,
और
औचक निगाहों से देखा था तुमने,
दरवाज़े पर खड़े हो कर
गलियारे में घूमती अपने नाम की पुकार को,
कॉफ़ी का मग हाथों से ले
घूँट-घूँट पीते हुए मुस्कराहट
तुमे सांस-सांस कहा था
सुबह-ए-बनारस!

इस याद का एक टुकड़ा भर लिया है बाहों में,
जब कभी आओ
और
चाहो बंद पड़े किवाड़ खोलना,
तो
गढ़ लेना एक चाबी,
उसी याद का एक टुकड़ा बिठा आई हूँ,
जब लगोगे उसके गले
तो, इसी दुनिया के दो छोरों पर,
आधी-आधी मुस्कान जीते दो लोग
हँस पड़ेंगे।

( फोटो उस घर के एक हिस्से की है जहाँ अभी सिर्फ मैं हूँ , यकीनन कुछ दिनों बाद तुम भी होओगे)

Photo: अक्षरों को जीती
थम गई थी उंगलियाँ,
और 
औचक निगाहों से देखा था तुमने,
दरवाज़े पर खड़े हो कर
गलियारे में घूमती अपने नाम की पुकार को,
कॉफ़ी का मग हाथों से ले
घूँट-घूँट पीते हुए मुस्कराहट
तुमे सांस-सांस कहा था
सुबह-ए-बनारस!

इस याद का एक टुकड़ा भर लिया है बाहों में ताला लगाते हुए,
जब कभी आओ 
और
चाहो बंद पड़े किवाड़ खोलना,
तो
गढ़ लेना एक चाबी,
उसी याद का एक टुकड़ा बिठा आई हूँ,
जब लगोगे उसके गले
तो, इसी दुनिया के दो छोरों पर,
आधी-आधी मुस्कान जीते दो लोग
हँस पड़ेंगे।

( फोटो  उस घर के एक हिस्से की है जहाँ अभी सिर्फ मैं हूँ , यकीनन कुछ दिनों बाद तुम भी होओगे)

Thursday, 16 October 2014

ढलती सड़क से उतरते लड़की ने रक्खी थी
एक कहानी उसकी हथेलियों में,

लड़के ने "ओह" कहते हुए
कहानी के बंद खोल
उछाल दिए सारे अक्षर,

कांधों पर बैठते, गर्दन से टकराते, बाहों पर से फिसलते-बिखरते लफ़्ज़ों में से
लड़की ने
उसके नाम का एक अक्षर उठा
बंद मुट्ठी पीठ पीछे कर ली.

लड़के ने उसके सब्ज़ होंठ छुए
इतना सा झुका की रख सके
उसके सीने में एक मुस्कराहट,

आँख भर ली जाए
बस
इतनी देर देख लड़की ने उसे
निगाहों से चूम लिया,

लड़के ने उसकी आँखों में जाले रखे
और
उसके कानो में अपने शब्द्फूल पहनाये
रौशनी बनने से पहले,

उसी ढलती सड़क पर
उसी तरह धूप में
अब भी वो लड़की
उन शब्द्फूलों  की उन्नाबी झनकार  में गुम,
कुछ अधूरी बातों में
हमेशा याद रह जाने वाली
एक मुकम्मल कहानी की तरह
खड़ी है!!  

Tuesday, 7 October 2014

birthday bash



जन्मदिन हर साल चला आता है. चला ही नहीं आता बल्कि आने से करीब 15-20 दिन पहले इंतज़ार भी करवाता है. हर साल रंग बदलता है लेकिन फिर भी इसके आने से हर कोई खुश ही होता है. ऐसी जलवाफरोशी तो हमने आजतक किसी और की देखी नहीं. बहुत पहले किसी ज़माने में जब दोस्तों की संगत से दिन शुरू और खत्म हुआ करते थे तब हमारे जन्मदिन को कैलेण्डर में हंगामाखेज़ दिन के रूप में लिखा जाता था. ईश्वर भी उस दिन पूरे मूड में होते और बेतरह कहकहे लगाते. इतने ज्यादा की उनकी आँखों से गिरे हुए पानी में हम घुटनों तक डूब जाया करते थे. रस्ते के गड्ढे पनाह मांगते की बक्श दो भाई . सड़कों के किनारे पानी ऐसे दौड़ता की सीने में हौल उठने लगती. लेकिन मानना पड़ेगा दोस्तों को जो किसी के हौसले में जरा सी भी कमी आती हो. हर दोस्त अपने ख़ास अंदाज़ में हमें बताता की हमारे पैदा होने भर से ये दिन कितना अहम् कितना खास हो गया है. शादी के बाद पता चला की बिना हंगामे के भी ये दिन गुज़ारा जा सकता है. अब ईश्वर भी उस दिन सिर्फ मुस्कुरा देता और सड़कों पे पानी भी संभल संभल के कदम उठाता. हमें भी आदत हो चली थी इस शांति की कि अचानक इस साल हमारे पतिदेव को जाने क्या सूझी की उन्होंने एलान किया की वो इस दिन को हमारे लिए ख़ास बनायेंगे. सुनते ही तो हमारे आस-पास ख़ुशी के लड्डू ऐसे फूटे की हम डर से सहम ही गए की कहीं हमें डायबिटीज़ ना हो जाए. इसलिए हमने तय किया की हम इन लड्डुओं को हौले-हौले हाथ लगायेंगे न की नदीदों की तरह एक ही बार में गप से मुंह भरेंगे.

इस साल हमारा जन्मदिन शनिवार को था तो पतिदेव घर में ही थे. हमने अपनी उम्मीदों को परवान चढाने से पहले थोडा सब्र किया, ठन्डे पानी की दो घूँट हलक से नीचे उतारी. पतिदेव का एलान सुन कर उन दो घूंटों ने भी हलक में ऐसा नाच दिखाया की जान जीभ पर आ कर बैठ गई. उसे दाँतों के नीचे दबा कर रोका. सर पर दोहत्तड मारे. तभी याद आया की पानी पीते समय अगर धसका लगे तो इसका मतलब कोई याद कर रहा है. सारे दोस्तों, सारे महबूबों को कोसा की भला ये भी कोई तरीका हुआ याद करने का की जान ही निकाल दो. खैर उस समय तक इंतज़ार किया जब तक पतिदेव एंग्री बर्ड में जीतने न लगे. जब वो दो-चार गेम जीत चुके तो हमने उनके हाथ में चाय का प्याला पकडाया और धीमे से पूछा-

"आज का प्लान क्या है?"

जवाब मिला--" जो तुम चाहो, आज जो कहोगी वही होगा"

सुनते ही तो हमारे कानो ने एक पल भी गवाएं बिना अपने सारे दरवाज़े खिड़कियाँ बंद कर ली. कहीं ये मीठे से, खूबसूरत से, सुरमई से, नशीले से, मोहब्बत से लबरेज़ अलफ़ाज़ निकल न जाएँ. उस पल तो घंटाघर का वो बड़ा सा गजर भी कानो के करीब आ बजता तो उनपर कोई फ़र्क नहीं पड़ता. हमारा दिल बल्लियों उछल रहा था. धडकनें सीने से ज्यादा कनपटियों पे बज रही थी.

पतिदेव ने पूछा बोलो कहाँ चलोगी?

हमने कहा जिधर को रस्ता हो गाडी उधर ही मोड़ दीजियेगा बिना जाने की कहाँ आ गए, कहाँ पहुंचेंगे.

मतलब?

मतलब की बस ऐसे ही जोधपुर की सड़कों पर चक्कर लगाने हैं.

पतिदेव की नज़रों ने चुगली कर दी की वो हमें अहमक समझ रहे है. हलकी हलकी बारिश हो रही थी. बताया था न की अब ईश्वर भी कहकहों की जगह मुस्कुराने लगा था वो भी शांति से. हमने ईश्वर की तरफ एक बोसा उछाला और गाडी में बैठ गए. पतिदेव ने अनजान सडको, अजानी गलियों में तब तक घुमाया जब तक हम सीट पर धीमे-धीमे नीचे की तरफ न सरकने लगे. हमारी तरफ देखते हुए मुस्कुरा के पूछा " थक गई ? वापस चलें?

बिलकुल भी नहीं , हाँ भूख लग रही है कुछ खिला दो

"बोलो कहाँ चलोगी? तुम्हारी पसंद के रेस्ट्रों में चलेंगे.

हमने मन में सोचा वो माराsssss बेट्टा! आज तो मजा ही मजा.

ऐसा नहीं की पतिदेव के मिजाज़ से वाकिफ नहीं हम सो हमने धीरे से कहा की आज स्ट्रीट फ़ूड खाना है. बोलते ही हमें गाड़ियों में सीट बैल्ट की अहमियत पता चली. उस दिन अगर सीट बैल्ट न पहनी होती तो हम गाडी का सामने वाला शीशा तोड़ कर सड़क की गोदी में खेल रहे होते. गाड़ी की चर्रर्र की आवाज़ के बीच पतिदेव ने पूछा --"क्या कहा तुमने"

"तुमने वादा किया था की आज सब कुछ हमारी मर्ज़ी के मुताबिक़ होगा"

पतिदेव से नज़रें मिला ही कौन रहा था की पता चलता की वो हमें खा जाने वाली नज़रों से घूर रहे हैं या मुहब्बत भरी नजर से निहार रहे हैं. खैर पतिदेव को अपना वादा याद था तो गाड़ी घुमाई और हमें स्टेशन रोड ले गए. वहां लाइन से सड़क किनारे एक तरफ बहुत से ढाबे नुमा कुछ थे . पतिदेव ने गाड़ी की स्पीड कम की और कहा--जो ढाबा अच्छा लगे बता देना उसके सामने ही रोक दूंगा.



वो ढाबे नुमा जो कुछ भी थे उन्हें देख कर हम तुनक गए . मुंह से बोल निकलता तो कैसे. हमारे स्ट्रीट फ़ूड के ख्वाब का ये हाल होगा सोचा न था. गाड़ी धीमी चलती हुई सड़क के आखिर तक आ गई. पतिदेव ने मुस्कराहट छुपाने की कोशिश तक नहीं की और प्यार से कहा वापस एक चक्कर लगाऊं? शायद इस बार आपको कोई ढाबा अपने मन मुताबिक दिख जाए.

हमने कहा- जी नहीं! कोई जरुरत नहीं, आप हमें सरदारपुरा ले चलें.

हमारी बात सुन कर इस बार पतिदेव ज़रा खुल कर मुस्कुराए , कहा -"जिप्सी चलोगी?

ना

15 A. D.?

हमने इनकार में सर हिलाया. उस इनकार में इतनी मासूमियत थी की एक बार को तो खुदा भी फ़िदा हो जाता. सच्ची कसम से. और ये तो हमारे पतिदेव थे . सरदारपुरा पहुँच के बोले अब कहाँ?

हमने कहा-- जिप्सी के ठीक सामने एक छोले-कुलचे का ठेला है, वहां चलना है . हमने अक्सर वहां बहुत भीड़ देखी है.

पतिदेव की आँखें चौड़ी हो गई- "तुम वहां खाओगी? पक्का?

हाँ!

हमारा इरादा पक्का था. कितने समय से तो उस ठेले की महक हमें अपनी ओर खींच रही थी, ज़माना हो गया था सड़क पर चलते चलते आइस्क्रीम खाए हुए. रिक्शा रोक उस पर बैठे-बैठे चाट के ठेले पर से वो गरम गरम आलू टिक्की और गोलगप्पे खाए हुए. सच बताएं उस दिन छोले-कुलचे के ठेले पर खड़े हो कर दोस्त बेतरह याद आये. अब न तो बनारस की विश्वनाथ गली के गोलगप्पों में और न ही काशी चाट भण्डार की आलू टिक्की में वो स्वाद रहा.

"मैं गाड़ी से भी नहीं उतरूंगा". पतिदेव फरमाए.

"मत उतरियेगा"

"मैं खाऊंगा भी नहीं."

हमने कहा "हम अकेले खा लेंगे, आप चलें तो सही"



हमने एक प्लेट छोले-कुलचे पैक करवाए. देख कर थोडा अफ़सोस हुआ की पत्ते के दोनों की जगह प्लास्टिक की कटोरियों ने ले ली थी. खैर हमने सोचा की हम अपना मूड ऑफ नहीं करेंगे और जैसे सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है वैसे ही हम भी इन प्लास्टिक की कटोरियों को हरे पत्तों से बने दोनों की तरह ही देखेंगे. हमने गोदी में रख नरम-नरम कुलचे का हौले से एक टुकड़ा तोड़ा और उसे गरम-गरम छोले में लपेट कर ज्यूँ ही मुंह में रक्खा हम उस छोले-कुलचे वाले के कायल हो गए. गुलज़ार साब के एक गाने "बीड़ी जलइले जिगर से पिया, जिगर में बड़ी आग है" का मतलब उन छोलों-कुलचों के एक, सिर्फ एक निवाले ने एक पल के सौवें हिस्से में समझा दिया. अगले गस्से के लिए उँगलियों ने उठने से और मुंह ने खुलने से सरासर इनकार कर दिया. हम भी हिम्मत हारने वालों में से नहीं थे सो हमने वाह! क्या स्वाद है कहते हुए एक कुलचा खत्म किया. पतिदेव को स्वाद का यकीन दिलाने के लिए उंगलियाँ भी चाटीं. हमारे कानो से निकलती गरम हवा शायद पतिदेव ने अपने चेहरे पे महसूस की , जूस की दूकान के सामने गाड़ी ले गए और पूछा "पियोगी"

मुंह खोलते तो पक्का ड्रैगन की तरह आग की लपटें छोड़ते सो हमने मन भर की गर्दन हाँ में हिलाई. सच कहते हैं लोग दोज़ख और जन्नत इसी दुनिया में हैं. जूस पीते ही लगा जन्नत में कदम रख दिए हों हमने. आखिरी निवाला मुंह तक पहुँच हमारी उँगलियों की कैद से रिहा होने ही वाला था की पतिदेव की आवाज़ नहीं , नहीं ,अलफ़ाज़ सुन वो निवाला क्या, वो उंगलियाँ क्या, हम ही जड़ हो गए.साहब बहादुर फरमा रहे थे-" गिफ्ट क्या लोगी"? हमने निवाले को मुंह में ढकेला , चटपट नैपकिन से हाथ साफ़ किये, जलती हुई जबान और मुंह के अहसास को गाडी से बाहर धक्का दिया और लगे सीट के अगल-बगल, ऊपर-नीचे, आगे-पीछे ढूँढने. पतिदेव ने हैरत से पूछा-" क्या गिर गया, क्या ढूंढ रही हो?

चिराग

मतलब?

अगर आपके सर पर जिन्न बैठा है तो चिराग भी होना ही चाहिए न. बस हमें ये याद नहीं आ रहा की हमने चिराग रगड़ा कब? और हम तो चिराग रख के भी भूल गए की कहाँ रखा है. हमें लगा हम वाकई में रुआंसे हो जायेंगे.

पतिदेव ने "बोल लो , बोल लो, जो बोलना है" वाली निगाहों से हमें देखा.

"गिफ्ट लेना है या नहीं लेना? इस बार पतिदेव के अन्दर का फौजी बोला.

लेना है, बिल्कुल लेना है. लेकिन गिफ्ट तो आपकी पसंद का होना चाहिए ना. ये बोलते हुए हमें अपनी आवाज़ और बकरी की आवाज़ में कोई फ़र्क महसूस नहीं हुआ. पता नहीं छोले-कुलचे का असर था या फ़ौजी आवाज़ का.

नहीं भई, गिफ्ट भी तुम्हारी ही पसंद का , आखिरकार आपका जन्मदिन है. बोलो कहाँ चलोगी गीतांजलि या तनिष्क?

हम जिस तेजी से फूल कर कुप्पा हुए थे उसी तेजी से गीतांजलि और तनिष्क के नाम ने हमारी हवा निकाल दी. हमें पता है इस पल हमें सुनने वाली हर औरत हमें दुनिया की सबसे बड़ी अहमक के खिताब से नवाजने को व्याकुल होगी. शायद भगवन ने हमें अपनी पीठ की तरफ रख के बनाया था और हमारे हाथ में छलनी भी पकड़ाई थी. हमें ये भी पता है की इस एक जुमले को सुन के हमारे सारे दोस्त हमें शाबाशी देंगे की ज़िन्दगी के आखिरी सालों में ही सही हमने सच बोलना सीख लिया.

गिफ्ट हमारी पसंद का होगा न. हमने एक बार फिर तस्दीक की.

बिलकुल, बिलकुल, आज हमने वादा किया है सब कुछ आपकी पसंद का .

तो फिर हमें मोहनपुरा ओवर ब्रिज तक ले चलिए.

उस भीड़ भरी सड़क पे? वहां कौन सा शोरूम है? पतिदेव आश्चर्य चकित थे.

आप चलिए तो सही. हमने इसरार किया.

ब्रिज पर चढ़ने से पहले जो दाहिनी तरफ थोड़ी खुली सी जगह है हमने गाड़ी वहां रोकने को कहा. कोई और दिन होता तो हमारी हरगिज़ हरगिज़ हिम्मत न होती गाड़ी वहां रुकवाने की. लेकिन उस दिन को तो ख़ास बनाने का वादा था. उस जगह खड़े हो कर देखो तो एक बड़ी खूबसूरत ईमारत दिखाई देती है. गहरे गुलाबी रंग में रंगी हुई. पुरानी सी हवेली जो जाने कितने राज़ समेटे चुपचाप खड़ी है. ब्रिज पे खड़े हो जाओ तो उसके लोहे की रेलिंग लगे हुए गलियार दिखते हैं. हमें जाने क्यूँ उन गलियारों की तरफ नज़र करते ही लगता है अभी कोई महारानी आएँगी डूबता सूरज देखने.

दिमाग फिरने की उम्र हो चली है तो शायद उम्र ने नज़रें इनायत कर दी हों , लेकिन कुछ भी हो हमें हमेशा लगता है की हमारा और उस हवेली का जरुर ही पिछले जनम का कोई नाता है.

हमने पतिदेव को गाड़ी से उतारा और थोड़ा आगे चलने के लिए कहा.




"अब बता भी चुको की तुम्हे क्या चाहिए"? हमें पता था की हम अपनी किस्मत पूरी तरह आजमा चुके हैं.




हमने सामने दिखती हवेली की तरफ इशारा किया -" ये चाहिए! इसे हमारे नाम करवा दें".






पतिदेव के जवाब के इंतज़ार में हम हवेली को निहार रहे थे की अचानक कानो में धाड़ की आवाज़ आई. पलट कर देखा तो पतिदेव लाल चेहरा लिए गाड़ी में बैठ चुके थे . सच्ची अगर सरकार ने तोप बन्दूक रखने की इजाज़त दी होती तो पतिदेव वहीँ हमें इक्कीस तोपों की सलामी दे डालते . खुदा का शुक्र की सरकार की ज़हानत अभी बाकी है. पैरो ने अलग आफत में डाल दिया ये कह कर की अगर हमें मरने का शौक है तो हम जा सकते हैं वो तो रत्ती भर भी नहीं हिलेंगे. ईश्वर गिनती करता थक गया की हमारे पैरों ने जाने कितने वादे लिए हमसे मालिशों और नई-नई सेन्डलों के. मरता क्या न करता वाली तर्ज़ पर हम ने जल्दी-जल्दी सारे वादों की हामी भरी और चुपचाप जा कर गाड़ी में सर झुकाए बैठ गए.

"एक तो वैसे ही ज़रा सा चेहरा है उसे भी सिकोड़ लोगी तो खाली कंधे ही नज़र आयेंगे .




सुनते ही तो हम फूल से हलके हो हवा में उड़ने लगे.इत्ता भी बुरा ताना नहीं था. पतिदेव का मूड थोड़ा दुरुस्त है का ख्याल आते ही हमारे दिमागी घोड़े लगे फिर दौड़ने.

या तो हमारी आँखें ख़राब हो गई थी या पतिदेव बैठे बैठे मोटे हो गए थे. घर से चले थे तो पेट अन्दर ,सीना बाहर और कंधे चौड़े वाली हालत में थे. अचानक क्या हो गया था. क्या गुस्सा पीने से तोंद निकल आती है? पता नहीं क्यों सारे बेफिजूल के ख्यालों को हमारा दिमाग ही नज़र आता है घुसे चले आने के लिए. अब तक तो हमें यकीन होने लगा था की हमारा दिमागी तवाजुन सी-सॉ झूले पे जा बैठा है और उसका साथ हमारी आँखें दे रही हैं. आँखों के साथ-साथ उस दिन तो हमारी गर्दन भी गई होती उन शीरीं लफ़्ज़ों को सुन के अगर हमने ख्याल न रखा होता. शीरीं जुबां से निकलते शीरीं लफ्ज़ उफ़, उस दिन पता चला की टीवी पे कार्टून्स की आँखें कैसे जमीन छूती हैं. हमारे कानो ने शर्तिया ही हमें बिना बताये चारों धाम की यात्रा की होगी जो ऐसे अलफ़ाज़ सुनने को मिले. पतिदेव कह रहे थे " अच्छा अब सीरियसली बताओ क्या लोगी"

हमें भी न खड़े पैर दोज़ख का रुख कर लेना चाहिए जो इन्ने अच्छे पति के साथ ऐसा मजाक किया. वैसे भी हमारी कोई गल्ती नहीं महबूब से मिलने के ख्याल ने हमसे ये सब कराया. हमने धीमे से कहा --" वो सामने जो बुक स्टोर है न वहां से किताबें दिलवा दें"

"हद्द है, तुम कभी सुधर ही नहीं सकती, बीवियां ख्वाब देखती हैं, जिद करती हैं कपड़ों और जेवरों के लिए और एक तुम हो "

"हाँ! तो आपको तो खुश होना चाहिए न की इंटेलेक्चुअल बीवी है आपकी"

"जी! जी!' घर को कबाड़ी की दूकान बना रखा है, जिधर देखो किताबें, डायरियां, पन्ने बिखरे रहते हैं"

"बिखरे ही रहते हैं कुछ कहते तो नहीं आपको"

"कहते नहीं? सारी किताबें आपकी जबान से ही तो बाहर निकलती हैं. खुशनसीब होते हैं वो लोग जिनके घरो में बीवी के दुपट्टे बिखरे रहते हैं, यहाँ तकिये उठाओ तो पन्ने बिखरते हैं. लोगो के खाने में बीवी के बाल निकलते हैं और यहाँ रोज़ अलग अलग डिग्री का जला हुआ खाना मिलता है."

मतलब आपको खाने में बाल मंजूर है? हैरत ने हमारी आवाज़ थोड़ी जोशीली कर दी.

कोई माई का लाल बिना चखे बता के दिखाए की गोभी है या करेला , सबकी एक जैसी शकल."

ये इलज़ाम सुनके सारा जोश हमें लिए वापस दुबक गया.

"हम सबको एक ही नज़र से देखते हैं गोभी हो या करेला, दुभात नहीं करते". हम बुदबुदाए

"कुछ कहा आपने?

हमारी मति थोड़ी न मारी गई थी जो अपनी बात दुहराते. हमने ना में गर्दन हिलाई, थोड़ी सी उम्मीद बची थी की शायद बुक स्टोर चले जाए. महबूब के दर तक आ कर खाली हाथ वापस लौटने से बड़ा दुःख कोई नहीं. अब पतिदेव को कौन समझाए की जब महबूब सीने पर सर रखे आपको निहार रहा हो तो उसे इसलिए नहीं उठा देते की चावल जल रहे हैं. चावलों का क्या है दुबारा-तिबारा बन जायेंगे. महबूब की हथेलियों की गर्मी को ठुकरा कर भला कहीं दाल -सब्जी की कडछी पकड़ी जाती है? पति देव ने कभी इश्क किया हो तो समझ भी आये ये जूनून.

चलती गाड़ी से गर्दन मोड़-मोड़ के हम महबूब का दर निहारते रहे , सारे महबूब इंतज़ार में बैठे होंगे. कितने ख्वाब थे की आज तो जी भर के गले लगेंगे, बाहों में भरेंगे.महबूब से न मिल पाने का वो दर्द, वो उदासी ,उसे बयान करना हमारे बूते में नहीं.

" उल्लू नहीं हो जो गर्दन घूम जाएगी"

फिर कभी सही के ख्याल के साथ गर्दन सीधी कर हम चुचाप घर आ गए.



























अगली सुबह हमें अपनी खूबसूरत नाजुक पतली लम्बी ( कुछ बचा तो नहीं न , ना मेरे ख्याल से तो नहीं) उँगलियों को देख कर लगा की हीरे की अंगूठी को भी गुरुर हो रहा होगा। और हाँ इस विडियो का हमसे कोई लेना देना नहीं , फोटोग्राफ्स जरुर हमने खींची हैं सारी की सारी।



























Saturday, 4 October 2014

अपने सपनो को तुम्हारी हंसी में गूंथ कर
एक कागज़ बनाउंगी
और
उस पर लिखूंगी एक कविता
तुम्हारी आँखों से मेल खाती
और फिर
मोड़ कर बना दूँगी
उसे
एक डोंगी
लगाऊंगी उसमे एक पाल भी
और
छोड़ दूँगी उसे
खूब-खूब बारिशों में
दुआ करना
तुम तक पहुँच जाए
या
भीग जाये

आमीन!!!!

Friday, 26 September 2014

दिल्ली से बनारस

अचानक ही प्रोग्राम बना की कल बनारस चलते  है. पूरे पांच दिन की छुट्टियां मिल रही थी. हम आठ लड़कियों को लगा की कुबेर का खज़ाना मिल गया है. बनारस की हम आठ लड़कियां दिल्ली में एन.सी.इ.आर.टी. में पढ़ते थे  और वहीँ हॉस्टल में रहते थे. पहली मुश्किल की एच ओ डी को छुट्टी की एप्लीकेशन कैसे दी जाए. आशा भटनागर मैम  के सामने छुट्टी की एप्लीकेशन रखना मतलब शेर के मुंह में हाथ डालना. खैर तय हुआ की सभी जायेंगे एक साथ उनके रूम में. हम सभी  ने  तय किया की  लोकल गार्जियन के घर जाने की बात कहेंगे. हमारा बहाना समझते हुए भी मैम ने छुट्टी के लिए हाँ कर दी. लोकल गार्जियन को ये बताना भी जरुरी था की घर जा रहे हैं ऐसा ना हो की वो इन पांच दिनों में फोन कर दें या मिलने आ जायें. उन दिनों मोबाइल नहीं हुआ करते थे और हम हौस्ट्लर्स के लिए एक फोन था जो की वार्डन की गैलरी में रखा होता था. गैलरी का गेट बंद रहता था और हमें गेट के सरियों में से हाथ डाल  के फोन उठाना होता था. कॉल सिर्फ रिसीव कर सकते थे. एक ने कहा इतनी जल्दी रिज़र्वेशन नहीं मिलेगा. मैंने कहा देखते हैं क्या होगा. स्टेशन पहुँचने का वक़्त तय कर हम सब घर चले गए.
                                                                                                                                                                     नियत समय पर स्टेशन पर इकट्ठे हुए. काशी विश्वनाथ का टिकट लेना था. रिज़र्वेशन तो दूर की बात आर ए सी भी नहीं मिला. वेटिंग टिकट ले कर चढ़ गए गाड़ी में. इतना यकीन था की टी टी उतारेगा नहीं. उस समय दिन के दो बजे के आस-पास चलती थी काशी विश्वनाथ. हम आठों टॉयलेट के पास न्यूज़ पेपर बिछा कर बैठ गए. गप और गाने शुरू हो गए लेकिन कितनी देर? सात बजते-बजते हम सबका बुरा हाल हो गया. ट्रेन फुल थी तो बर्थ मिलने की कोई गुंजाइश भी नहीं थी. मैंने सबसे कहा की जिसको जहाँ जगह मिले पैर फैला कर सो जाओ. एक ने कहा की जिसकी बर्थ है वो आ गया तो? तो मैंने कहा सॉरी बोल के उठ जाना. मुझे भी जहाँ जगह मिली वहीँ सो गई. कितनी रात थी पता नहीं, अचानक लगा कोई हिला रहा है. एक झटके में उठ के बैठ गई. देखा एक सज्जन से व्यक्ति हाथ में टिकट और चेहरे पर असमंजस का भाव लिए मुझे उठाने की कामयाब कोशिश कर चुके हैं. उन्होंने कहा माफ़ कीजिये मेरे टिकट के हिसाब से ये बर्थ मेरी है. उन्होंने मुझे टिकट दिखाने की कोशिश की. मैंने कहा जी बिलकुल-बिलकुल ये बर्थ आपकी ही है. उन्हें भौचक्का सा छोड़ मैंने अपनी चादर समेटी और ये जा वो जा. जाते-जाते सुना "ये आजकल की लडकियां.......".मैं  पहुँच गई वापस वहीँ टॉयलेट के पास. एक-एक करके दस मिनट में  बाकी सभी भी आ गए. हमने एक दूसरे को देखा और गगनचुम्बी ठहाका लगाया.

Thursday, 25 September 2014


जयपुर के दैनिक खुशबु में , बहुत बहुत शुक्रिया वर्षा जी
















Friday, 19 September 2014

17 साल हो गए शादी को लेकिन माँ की नज़र में आज भी वही सिलबिल्ली सी लड़की हूँ जो खाना बनाने में ना-नुकुर करती है. पति के शहर से बाहर जाने पर माँ जरुर फोन करती है ये पूछने के लिए की खाना क्या बनाया है. माँ अक्सर मुझसे सब्जियों के भाव भी पूछती हैं, मैं भी उन्हें बताने के लिए ही सारी सब्जियों के भाव पता रखती हूँ. उन्हें ये भी पता है की मैं बिना सब्जियों के भाव पता किये खरीदती हूँ, आज माँ ने फिर फोन किया की
 "खाना क्या बनाया है"
"आपको क्या लगता है की मैं खाना नहीं बनाती?"
"हाँ! ऐसा ही लगता है"
"पिज़्ज़ा, पास्ता बनाया है या रोटी सब्जी"?
"रोटी सब्जी" मैंने बड़े धैर्य से जवाब दिया.
"अच्छा तुम्हारी तरफ टमाटर क्या भाव हैं" माँ ने बड़ी सहजता से पूछा.
"माँ , एक बात बताइए, मैं सब्जी वाले के पास जाऊं और उससे पूछूं ---भैया टमाटर क्या भाव हैं?, वो कहेगा----100 रुपये किलो, मैं कहूँगी --haaaaawwwwww इतने महंगे! अच्छा  एक किलो दे दो.
"तुम इतने महंगे टमाटर खरीदोगी?" , माँ ने मुझे बीच में टोकते हुए कहा.
"आप पूरी बात तो सुनिए, हाँ तो मैं गई सब्जी वाले के पास और मैंने उससे टमाटर का भाव पूछा, ठीक!, अब मैं

दुबारा गई सब्जी वाले के पास और कहा की भैया एक किलो टमाटर दे दो, अब आप ही बताइए माँ इन दोनों

सेंटेंस में सिर्फ "haaaaaaawwwwwwwww इतने महंगे!" इसी बात का तो तो फर्क है न .
" बड़ी सुन्दर लग रही है अपनी माँ से ऐसे बात करते हुए "
और माँ ने फोन रख दिया.
एक-दो दिन में फिर फोन करेंगी माँ, आखिर माँ है ना!

खाना बनाते वक़्त अपने 16 साल के  बेटे से बतियाना मजेदार अनुभव होता है. स्कूल से आते ही वो रसोई में मेरे पास खड़ा हो दिन भर की रामकहानी सुना डालता है. इस तरह मैं भी एक बार फिर से  अपने स्कूली दिनों को  जी लेती हूँ . जब वो बताता है की किस दोस्त के साथ क्या बदमाशी  की, आज किस बात पे डांट पड़ी तो लगता है उसके साथ ही स्कूल में मैं भी दिन बिता के आई हूँ. उस दिन भी कुछ ऐसा ही चल रहा था, मैं खाना बना रही थी और वो बातें बताने में मशगूल था. उसकी बातों को सुनते , जवाब देते मैंने हींग का डब्बा उठाया और उसकी नाक के आगे रख दिया. बातों में मशगूल बेटे ने जोर की सांस खीची और क्या है ये कहता हुआ उचल पड़ा. मैंने मुकुराते हुए कहा "हींग". " पानी दो माँ", "आक्थू", "हद्द है", "आप भी न माँ" जैसे वाक्यों का लम्बा सिलसिला चला. मैं हँसते -हँसते दोहरी.
                         बात यहीं ख़त्म नहीं हुई, सपूत का अक्सर कहना मैं आपका एडवांस वर्ज़न हूँ मैं भूल सा गई थी की आज उसने याद दिला दिया.  शाम को बेहद व्यस्त सा दिखता हुआ मेरे पास आया
"माँ ,सुनो तो"
मैंने  लैपटॉप पे निगाहें जमाये-जमाये कहा "बोलो", लेकिन तब तक तो देर हो चुकी थी. बेटा  अपनी पसीने से भीगी रिस्ट वाच का बैंड मेरी नाक के आगे रख चुका  था. अब हंसने की बारी उसकी थी और नाक-भौं सिकोड़ने   की मेरी.

Tuesday, 16 September 2014





मैं एक रेत के ऊंचे से टीले पर बिना किसी दिशा की तरफ मुंह किये बैठना चाहती हूँ, चाहती हूँ हवा भी कुछ देर के लिए वहीँ बैठी रहे मेरे पास और जब लौटे तो मेरे लौटने के तमाम निशान भी लेती जाए.



मैं किसी अनजान शहर की किसी व्यस्त सी सड़क पर टहलना चाहती हूँ जहाँ एक भी चेहरा मुझे न पहचानता हो लेकिन मैं उन सारे चेहरों की तरफ देख कर मुस्कुराना चाहती हूँ.


बेटे की तरफ देखती हूँ वो सो रहा है मैं उसे उठाना नहीं चाहती चाहे सारे ही जरुरी काम क्यूँ न पीछे छूट जाएँ, आज सुबह बड़ा जी किया की मैं भी ऐसे ही किसी के भरोसे गहरी नींद सो जाऊं की वक़्त होने पर वो मुझे उठा देगा .


अपने महबूब से मिलने के लाख जतन करती हूँ लेकिन हर बार सारी कोशिशें "फिर कभी" के टैग के साथ मुल्तवी कर दी जाती हैं . दुनिया के सारे जरुरी कामो की लिस्ट पर टिक करते हुए मेरी सबसे जरुरी चाह कहीं पीछे रह जाती है, मैं अपने भरोसे की उंगली नहीं छोडती की एक दिन महबूब के गले जरुर लगूंगी.


एक दिन वो सारे सच बोल देना चाहती हूँ जो मेरे गले में अटके पड़े हैं और देखना चाहती हूँ की कितनी इमारते भरभरा कर गिरती हैं और तब मैं इस और उस दुनिया की सबसे प्यारी मुस्कराहट मुस्कुराना चाहती हूँ.










उन सारी बातों पर जिनपे बस नहीं चलता या यूँ कहना चाहिए की कभी बस चलाने की कोशिश नहीं की , हर किसी को धता बता कर खुद को भी , एक बार बस चलाने की कोशिश करना चाहती हूँ,नतीजो की परवाह किये बिना. हालांकि हम बिना नतीजा जाने परखे कोई काम करना नहीं चाहते और न ही करते हैं , एक बार बस एक बार मैं नतीजों को मोड़ कर गद्दे के नीचे छुपा देना चाहती हूँ.






बहुत सारे सवालों को गले में जलते कोयलों में फूंक देना चाहती हूँ और वो बोलना चाहती हूँ जो हर वक़्त मेरी पीठ पर बेताल सा सवार रहता है.






कानों पे बंद मार अपने चेहरे के सारे मुखौटे न्याग्रा फाल्स में उछाल देना चाहती हूँ, किसी जहाज़ में समंदर की किसी अंतहीन यात्रा पर नहीं निकलना चाहती न ही किसी अरण्य में खोना चाहती हूँ, इसी दुनिया में बहुत सारे लोगों के बीच रहना चाहती हूँ.










अपनी जगह करीने से रखी हुई हर चीज़ , हर बात को बेतरतीबी के रंग में रंग देना चाहती हूँ सुकून के लिए.

















लिस्ट बहुत लम्बी है और एक दिन अपने हर जरुरी काम को पीछे रख के इस पूरी लिस्ट पर टिक लगाना है , इस टिक लगाने की उम्मीद में बाकी सारे काम मुस्तैदी से पूरे करते हुए जिए जा रही हूँ.










( painting by kamal rao)

omar

arabic/ hebrew  भाषा में बनी ओमर एक प्रेम कहानी है, फिलिस्तीन और इजराइल के बीच  संघर्ष की भी कहानी है , दोनों ही कहानियाँ बखूबी साथ चलती हैं .  पहली कहानी है बचपन के तीन दोस्त , ओमर , तरीक और अमजद की  , तीनो  दोस्त फिलिस्तीन के स्वयंभू स्वतन्त्रता सेनानी के एक ग्रुप का हिस्सा  हैं जिनका लीडर तारीक है . तीनो दोस्त फिलिस्तीन की आज़ादी के प्रति अपना समर्पण दिखाने के लिए एक इजराइली सैनिक की हत्या का प्लान बनाते हैं, गोली अमजद चलाता है,सैनिक मर जाता हैऔर उसकी हत्या के आरोप में ओमर पकड़ा जाता है. इजराइली अधिकारी  रामी ओमर को अपना  इनफॉर्मर बनने की शर्त पर रिहा करता है. रामी तारीक को पकड़ना चाहता है और इस काम में वो ओमर की मदद चाहता है , इनकार करने की सूरत में रामी ओमर को नादिया ,( जो की तारीक की  बहन है और जिसे ओमर बेहद प्यार करता है ) ,की ज़िन्दगी बर्बाद करने की धमकी देता है. ओमर अपनी ज़िन्दगी बहुत सारे फैसले नादिया को ध्यान में रख कर करता है.फिल्म ट्रैजिक है और किसी भी रिश्ते से ज्यादा दोस्ती को ध्यान में रख कर बुनी गई है.
                                                                                   दूसरी कहानी है ओमर और नादिया के प्रेम की. कहानी है प्रेम करने वालों के बीच शक पैदा करने वाले उन्ही के दोस्त की.
                               फिल्म की शुरुआत में ओमर फिलिस्तीन और इजराइल को अलग करती ऊंची  दीवार पर आसानी से चढ़ जाता है, उसे गोली लगने ही वाली होती है की वो एक झटके से रस्सी का सहारा ले दूसरी तरफ उतर जाता है . अपनी प्रेमिका नादिया से मिलने की उमंग में वो अपनी  हथेलियों पर लग आई खरोचों को भी अनदेखा कर देता है. उसका इस तरह दीवार पर चढ़ना  मुझे तब तक सहज लगता है जब तक की फिल्म के आखिर के एक दृश्य में ओमर बहुत कोशिशों के बाद  उस दीवार पर किसी की मदद से ही  चढ़ पाता है , अपनी इस असाहयता  पर ओमर का रोना मुझे स्तब्ध कर देता है  और मैं ओमर के साथ रोती हूँ की उसने अपने प्रेम को खो दिया है,  प्रेयसी से मिलने की बैचेनी की जगह उदासी ने ले ली है.  अब कोई नहीं उस दीवार के दूसरी तरफ जिससे मिलने की उत्कंठा उससे एक बेहद मुश्किल काम आसानी से करा देती थी. मैं जीती हूँ उन छोटे-छोटे पलो को ओमर और नादिया के साथ जिनसे उनकी ये प्रेम कहानी बुनी गई है. चाय के कप के नीचे रख कर दिए जाने वाले प्रेम पत्र, ख़त देते समय नादिया की भोली मुस्कराहट और उसके साथ मैं भी हज़ार सपने बुन लेती हूँ. ओमर नादिया से जब भी मिलता है उसे ख़त देता है,कितना अलग सा ख्याल है न जब मिले तब  उस वक़्त की और आने वाले वक़्त की बातें कर ली लेकिन जो वक़्त तुम्हारे बिना गुज़रा उसका हिसाब ?
                                                                                         जेल से छूटने के बाद ओमर देखता है की उसका बचपन का दोस्त अमजद नादिया से मिलने उसके स्कूल जाता है, नादिया अमजद  को  ख़त देती है. ऐसे ख़त तो ओमर और नादिया का हिस्सा थे. ओमर के साथ-साथ मैं भी नादिया पर शक करती हूँ कि वो बदल गई है . नादिया ओमर पर शक करती है , वो कहती है की लोग कह रहे हैं की ओमर इनफॉर्मर बन गया है वरना वो जेल से इतनी जल्दी कैसे छूट गया. इस बात का ओमर के पास कोई जवाब नहीं.  फिल्म के नायक ओमर के रूप में  बाकरी जिनकी ये पहली फिल्म है अपनी आँखों और चेहरे के हाव भाव से पूरी तरह कन्विंस करते हैं.
               मोहब्बत और जंग में सब जायज़ है इस बात को अमजद ने पूरी तरह जिया है. अमजद, ओमर और तारीक  से कहता है की वो और नादिया एक दूसरे से  प्यार करतें हैं और नादिया प्रैगनेंट है , ओमर और तारीक अमजद पर यकीन करते हैं , रिश्ते और मोहब्बत से ज्यादा दोस्ती पर यकीन. तारीक को नादिया से कुछ कहने या पूछने का मौका नहीं मिलता और ओमर अपने महबूब से ज्यादा अपनी समझ और दोस्त पर यकीन करता है. ये फिल्म हमें ये भी बताती है की हमेशा सब कुछ एक जैसा नहीं रहता, बचपन के दोस्त भी नहीं. ओमर हर तरह की मदद करता है अमजद की शादी नादिया से कराने में. शादी के लिए हाँ कहने से पहले नादिया ओमर से बात करना चाहती है वो नहीं सुनता, उसे ख़त देना चाहती है वो नहीं लेता
                          ओमर कहानी है प्यार, धोखे, संघर्ष, उम्मीद, यकीन, दोस्ती और सैक्रिफाइस की.
                                                                                                                              ओमर कुछ समय बाद जाता है अमजद से मिलने, अमजद तो नहीं मिलता ओमर को घर पर नादिया और उसके दो बच्चे मिलते हैं.
                                                                     ओमर के रूप में एडम बाकरी अपने  सहज अभिनय से मुझमे एक भरोसा एक उम्मीद जगाते हैं और मैं फिल्म देखने के लिए उनकी उंगली थाम लेती हूँ. बाकरी बेहद सरल  ढंग से ओमर का जीवन मुझे दिखाते हैं. 
                                                                                                           जब ओमर  अमजद के गले पे चाकू रखता  है  तो नादिया के लिए उस की तड़प दिखती है फिर क्यूँ वो नादिया से ज्यादा अमजद पर भरोसा करना चुनता  है ?
                                                                                                    नादिया से मिलने पर ओमर उससे उसके बड़े बेटे की उम्र पूछता है, नादिया कहती है की उसके बेटे का जन्म शादी के एक साल तीन महीने बाद हुआ था , नादिया ओमर से माफ़ी मांगती है की उसने ओमर पर शक किया.
                                                                              एक पल सिर्फ एक पल में ओमर समझ जाता है अमजद के दिए धोखे को और अब तक चमकती उसकी आँखें बुझने लगती हैं. इसके बाद की फिल्म देख कर लगता है की ओमर अमजद से बदला लेगा . निर्देशक Hany abu-assad ने ये हम दर्शकों की समझ पर छोड़ दिया है की ओमर ने अमजद का क़त्ल किया या नहीं. मेरी समझ में ओमर अमजद को नहीं मारता क्यूंकि अमजद के मरने से नादिया की ज़िन्दगी पर फर्क पड़ेगा. 
                            फिल्म के अंत में ओमर ये भी सुनिश्चित करता है की भविष्य में भी कोई अमजद को परेशान न कर सके. ओमर के हाथ में रिवाल्वर है और सामने इजराइली ऑफिसर रामी और उसके साथ के दो लोग हैं. गोली की आवाज़ आती है फिर स्क्रीन पर अँधेरा छा जाता है. ओमर ने रामी को मार कर आत्महत्या जैसा ही काम किया है. रामी के साथ आये ऑफिसर किसी भी हालत में ओमर को जिंदा नहीं छोड़ेंगे. और इस तरह ओमर धोखे की वो कहानी ख़त्म कर देता है जिसे अमजद ने शुरू किया था.


                                                                  ओमर एक ऐसी मालूम सी  कहानी है जिसे शायद हम सब जानते हैं की इस कहानी में ऐसा होगा लेकिन निर्देशक के साथ साथ एक्टर्स ने इसे आहिस्ता-आहिस्ता सांस लेते हुए सुनाया है और यहीं ये फिल्म अलग सी और ख़ास बन जाती है. एक ऐसी ट्रेजिक लव स्टोरी जिसमे हम उसके दुखद अंत को याद नहीं करते बल्कि ओमर-नादिया के प्रेम को याद रखते हैं.















Monday, 15 September 2014

finding fenny

फाइंडिंग फेंनी देखी, पंकज कपूर, डिंपल कपाडिया , नसीरुद्दीन शाह ये नाम ऐसे थे की कोई भी थिएटर तक खिचा चला जायेगा. लेकिन फिल्म देख कर लगा की इन तीनो ने ही बुरी तरह ठगा है. बहुत सारे लोगो को ये फिल्म बेहद अच्छी लगी, क्यूँ लगी मैं समझ नहीं पाई. कहानी के नाम पे शायद लेखक के दिमाग में कुछ हो जिसे निर्देशक परदे पे उतार नहीं पाए. फाइंडिंग  फेंनी  किसकी कहानी है? प्यार को ढूँढने की? अपने आप को ढूँढने की ? शायद निर्देशक को भी समझ नहीं आया .
         एक्टर्स ने उतना ही किया है जितना इस लचर सी कहानी में करने की गुंजाईश है. एक सीन में डिंपल कपाडिया की स्कर्ट पीछे से फटती है, किस लिए था ये सीन? हास्य के लिए? अगर यही स्कर्ट टखनो पर से फटती तो जाहिर सी बात है कोई हास्य उत्पन्न नहीं होता. यानी कि निर्देशक का कहना है की किसी महिला के एक विशेष जगह से कपडे फटने पर हमें हंसना चाहिए. कोई जरुरत नहीं थी इस सीन की.
                                           एंजी( दीपिका पादुकोण)  इतनी कंफ्यूज क्यूँ है,  क्या कोई भी लेडी तभी बोल्ड होती है जब वो अपने दोस्त से कहती है की उसने आखिरी बार छ साल पहले किस किया था और वो अपने दोस्त के साथ सैक्स करती  है? लेकिन अपने इस रिश्ते को वो माई के सामने स्वीकारने के लिए तैयार नहीं. दिन की रौशनी में जब साविओ(अर्जुन कपूर) एंजी को किस करता है तो वो साविओ को थप्पड़ मारती है और चिल्लाती है की वो ऐसी नहीं है और साविओ को सिर्फ दोस्त मानती है लेकिन उसी रात वो साविओ के साथ सैक्स करती है. दोस्ती और प्यार का ऐसा घालमेल सिर्फ होमी अदजानिया ही दिखा सकते हैं.
                                                   डॉन पेड्रो (पंकज कपूर) आर्टिस्ट कम और अहमक ज्यादा लगते हैं. रोज़ी के घुटने से स्कर्ट उठा कर उस घुटने का क्या स्केच बनाते हैं,कौन सा मास्टर पीस उन्हें वहां मिलेगा ये निर्देशक ही समझ सकते हैं. डॉन पेड्रो अंत में जो पेंटिंग बनाते हैं, उस पेंटिंग को देख कर रोज़ी हतप्रभ रह जाती हैं, डॉन पेड्रो भारी  भरकम डायलॉग बोलते हैं उसके बाद अच्छा होता की हम दर्शकों को भी उस पेंटिंग की एक झलक के बजाए पूरी तरह पेंटिंग  देखने का मौका मिलता. 
     फिल्म के आखिर में नसीरुद्दीन शाह ऐसा क्या देखते हैं की वो आगे का रास्ता अकेले तय करने का फैसला करते हैं, मुझे भी वो देखना था. नसीरुन्द्दीन शाह ने फर्डी की भूमिका में अपने आप को वेस्ट करते हुए न्याय किया है. नसीरुद्दीन शाह को देख के लगता है की फिल्म में उन्हें बाकी किसी से कोई मतलब नहीं, नसीर अपने रोल से पूरी तरह कन्विंस दिखते हैं.
शायद ये एक इंटेलेक्चुअल फिल्म बनाने की कोशिश की गई है जो गले नहीं उतरती.
फिल्म में इसका  एक गाना सुकून देता है लेकिन उसे भी देखने की बजाए आँख बंद कर सुनना ज्यादा सुहाता है.गाना शुरू होते ही पैर अपने आप थिरकने लगते है आप झूमना शुरू करते ही हैं की गाना ख़त्म हो जाता है और आप ठगा सा महसूस करते हैं. 
                                             कहानी में जब कुछ न हो तो कैमरा मैन के काम की तरफ भी ध्यान नहीं जाता.
कुल मिला कर यही कहा जा सकता है की अच्छे एक्टर्स भी एक लचर कथा, पटकथा और ख़राब निर्देशन में बनी फिल्म को अच्छा नहीं बना सकते , इसका उदहारण "फाइंडिंग फेनी" है. एक बेहद ख़राब फिल्म जिसमे पंकज कपूर, नसीरुद्दीन शाह और डिंपल कपाडिया की वेस्ट होती हुई एक्टिंग को देख कर अफ़सोस होता है.

Monday, 8 September 2014





प्रीत
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कैफ़े कॉफ़ी डे के खुशनुमा से माहौल में बैठने के लिए मेरी निगाहें कोई

खाली कुर्सी तलाश रही थी , कुछ ही सेकंड में निगाहों से कितना कुछ गुजर

गया, वो कोने वाली चेयर पर बैठा हुआ एक नौजवान जोड़ा , लड़की ने बड़ी

बेफिक्री से अपना बायाँ पैर सामने रखी टेबल पर रखा था और वो अपने साथी को

फोन में कुछ दिखा रही थी, दीवार से लगी हुई कुर्सियों पर कुछ महिलाएं

बैठी थी शायद किसी किटी की सदस्य थी या शौपिंग कर के लौट रही थी,

हंसते-खिलखिलाते , बातों में मशगूल लोगो से निगाह फिसलते हुए पीछे कोने

में कांच की दीवार से लगी हुई एक टेबल पर पड़ी,वो अकेली बैठी हुई अपने

आस-पास के शोर से कोसो दूर कप की गोलाई पर उंगलियाँ फिरा रही थी. लगा शायद किसी के इंतज़ार में वक़्त नाप रही है, कप की गोलाई पर उसकी आहिस्ता घूमती उँगलियों और उठती भाप को देखती रही, ऐसा ही तो होता है न , कुछ भी कर लो ज़िन्दगी का सिर हाथ ही नहीं आता , कुछ बातें , कुछ लम्हे हमेशा दो कदम आगे ही जा कर रुकते हैं।   उसके सामने की खाली कुर्सी आमंत्रण देती सी लगी. एक पल हिचकने के बाद मैंने

सोचा की पूछने में हर्ज़ ही क्या है , उसके साथी के आते ही मैं उठ जाउंगी

और एक कॉफ़ी पीने में वक़्त ही कितना लगता है. मन ही मन ये सब बुदबुदाते

हुए मैं उसकी तरफ बढ़ गई.

" मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?" पास जाकर मैंने सपाट स्वर में कहा
टेबल पर कोहनी रखे हथेलियों पर ठुड्डी टिकाये उसने मेरी तरफ देखा , उसकी

गहरी आँखों और लम्बी पलकों को देख मैं दो सेकंड के लिए अवाक् रह गई, मुंह

से बोल नहीं फूटा. उसने भी आँखों से ही बैठने का इशारा कर दिया,  बैठते

हुए मैंने कहा -"जैसे ही आपके मित्र आयेंगे मैं उठ जाउंगी"

कॉफी का घूँट लेते हुए उसने कहा   "नहीं, नहीं आप आराम से बैठें , कोई नहीं आने वाला", उसके शब्दो में एक निश्चिन्तता थी जिसने मुझे थोड़ा सा असहज कर दिया। उसे पता था की कोई नहीं आने वाला फिर भी वो बार बार दरवाज़े की तरफ देख रही थी।   अपने बैग्स मैंने कुर्सी की बगल में ज़मीन पर रखे और बैठते हुए एक बार फिर उसकी तरफ देखा, उससे पूछने के लिए मन में ढेरों सवाल आ रहे थे , बात करने की जबरदस्त इच्छा हो रही थी, लेकिन उसकी चुप्पी उसके शब्दों से होती हुई टेबल तक पसरी हुई थी।   सिल्क रंग की साड़ी पर चौड़ा ऑरेंज कलर का बॉर्डर , पल्लू लापरवाही से काँधे पर डाला हुआ,गर्दन को छूता जूडा और कोई जेवर नहीं, बिंदी तक नहीं अलबत्ता एक कलाई में घड़ी जरुर थी. उसकी पतली नाज़ुक सी नाक में अगर एक लौंग होती तो ? और काली भौहों के बीच लाल बिंदी कितनी अच्छी लगती. उसकी हथेली उसके एक तरफ को झुके हुए सर का सहारा बनी हुई थी और उसकी निगाहें दरवाज़े पर कुछ तलाश रही थी। उसके मग  के बगल में पेपर नैपकिन से बनी नाव रखी थी , बाहर बारिश नहीं हो रही थी, फिर भी बारिश के पानी में तैरती नाव के ख्याल भर से मैं मुस्कुरा उठी।उसे सोच में गुम देख मैंने भी इयरफोन कान में लगा फोन ऑन कर लिया, अचानक बाँह पर रखे  एक स्पर्श ने मेरी आँखें ऊपर उठा दी,
"एक किस्सा सुनेंगी"? उसका स्वर सुन कर चौंक उठी मैं। पसरी हुई चुप्पियाँ ऐसे भी बोलती हैं? कुछ जवाब दे पाऊँ इस से पहले वो उठ गई , कॉफी ले कर आती हूँ का धीमा स्वर मुझे थमा कर।
कॉफी के मग  के ऊपर से झाँकती उसकी आँखें , नहीं उदास तो नहीं थी , मरी हुई थी वो आँखें। किस्सा सुन कर आपके मन में कोई सवाल आये तो पूछियेगा जरूर लेकिन जवाब की उम्मीद के बिना , उसने मुस्कराहट पर कॉफी का घूँट रखते  हुए  कहा।  जाने उसने मेरे चेहरे पर क्या देखा की हलके से हँस पड़ी वो , जहाँ उसकी हँसी खत्म होती थी वहां उसने एक साँस भरी और एक सवाल मैंने गले में ही गटक लिया। शायद हर किसी को किसी अजाने से कुछ बाँटना आसान लगता है।                                                                                                                                                              उसने बोलना शुरू किया और मैंने उन शब्दों के मौसम को महसूस करना। 
उस दिन ना तो बारिश हो रही थी और ना ही तेज़ धूप थी , तारीखें मुझे याद नहीं रहती और महिना कोई भी हो अक्टूबर या जून फर्क क्या पड़ता है. उस दिन का वो पल बेहद खूबसूरत हो सकता था अगर प्रीत की कैफियत होती ध्यान देने की. जब हम खुश होते हैं, हंसी से लबरेज़ तो मौसम भी आपके साथ चहक उठाता है, है न! उसने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे अपनी बात के लिए मेरी हामी चाहती हो।   उसके किस्से से ज्यादा दिलचस्पी मुझे उसमे हो गई थी. उसका धीमी आवाज़ में रुक-रुक कर सुनाना ऐसा लग रहा था जैसे वो मुझे नहीं बल्कि खुद को ही वो किस्सा सुना रही हो. कागज़ की नाव से खेलते हुए वो सोच में गुम कह रही थी, "बड़ा अजीब सा दिन था वो प्रीत के लिए , प्रीत ने सुब्बू को इसी सीसीडी में बुलाया था. देखो न मुझे तो ये भी नहीं पता की वो कहाँ बैठे थे, किस चेयर पर, उसने आस-पास निगाह दौडाते हुए कहा. लेकिन जहाँ भी बैठे थे वहां धूप का एक टुकड़ा प्रीत के चेहरे को एक अलग रंग दे रहा था.

सुब्बू एकटक प्रीत को देखता रहा," तो तुम ये कहना चाहती हो की तुम्हारे पास ३००० रुपये भी नहीं हैं?

"किसने कहा की नहीं हैं, हैं बिलकुल हैं लेकिन वो मेरे नहीं रोहन के हैं."प्रीत ने स्थिर मन और शांत स्वर में कहा .
"डोंट बी स्टुपिड यार , तुम्हारी शादी को सिर्फ एक साल हुआ है और तुम्हारा

ईगो आने लगा इस रिश्ते में ".




"नहीं, कोई ईगो विगो नहीं है और शादी को सिर्फ एक साल नहीं हुआ बल्कि एक

साल हुए अभी सिर्फ तीन ही दिन हुए हैं" मुस्कुराते हुए प्रीत ने कहा.




सुब्बू कभी-कभी चिढ जाता है प्रीत की किसी भी सीरियस बात को मजाक में

उड़ाने की इस आदत से.




"मैं सीरियस हूँ प्रीत"




"मैं भी" प्रीत ने बेपरवाही से दो लफ्ज़ उछाल दिए .




"रोहन कहाँ है?"




"दिल्ली गया हुआ है , कल आ जायेगा". प्रीत पेपर नैपकिन से नाव बनाने में व्यस्त थी




कुछ तो है जो बदल गया है लेकिन क्या सुब्बू उस बदलाव को महसूस तो कर रहा

था लेकिन समझ नहीं पा रहा था. तीन दिन पहले ही तो मिला था वो प्रीत से ,

उसकी एनिवर्सरी पार्टी में, केक काटती प्रीत, फूंक मार कैंडल बुझाती

प्रीत, खिलखिलाती प्रीत, एक अच्छे होस्ट की तरह सबके खाने-पीने की परवाह

करती प्रीत, और आज ? सुब्बू ने प्रीत की तरफ देखा , बेपरवाह दिखने की

कोशिश सी करती  दिख रही थी प्रीत  उसे आज।
हुआ क्या है ? कुछ बोलोगी ?
कुछ नहीं, सब ठीक है।
चुप हो आज बहुत.
नहीं तो
प्रीत की चुप ने परेशान कर दिया सुब्बू को , वो जानता था ज़िद्दी है प्रीत , अगर उसने सोच लिया है की नहीं बोलेगी तो ब्रम्हा भी उसे नहीं बुलवा सकते।  
 "अगर कोई प्रॉब्लम है तो मैं बात करू रोहन से?"
"थैंक्स, बट  नो थैंक्स, चलती हूँ,काफी देर हो गई है", अपना बैग उठाती हुई प्रीत खड़ी हो गई , सुब्बू हडबडा गया,अरे!" रुको तो सही, बैठो, बात तो करो"

"क्या बात करू सुब्बू, मुझे जो कहना था, कह दिया मैंने और कुछ है नहीं कहने को।  बिना वजह पूछे दे सकते हो तो दे दो"
सुब्बू देख रहा था प्रीत को , उसके आधे चेहरे पर पड़ती धूप ने उसकी आँखों

की रंगत बदल दी थी शायद, प्रीत की हमेशा की पनीली आखें क्यूँ आज सुब्बू को सूखी सी लग रही थी, या फिर उसे ही कुछ ग़लतफहमी हो रही है ,प्रीत की तरफ देखते हुए सुब्बू ने सोचा।
जानती हूँ तुम्हे मेरी फ़िक्र है लेकिन यकीन जानो सब ठीक है।
प्रीत को मुस्कुराते हुए सुब्बू देख रहा था , इस मुस्कराहट को वो भेद नहीं पायेगा , कितनी भी कोशिश कर ले प्रीत उसे कोई सिरा  नहीं पकड़ाने वाली।  अच्छी तरह जानता है वो प्रीत को




"चलो"




"कहाँ?"




"अब इस वक़्त मेरे पास इतना कैश तो है नहीं ए टी एम् से निकाल के देता हूँ"




पैसे लेते हुए प्रीत ने कहा- "याद रखना, मैं ये उधार ले रही हूँ, कब तक लौटा

पाउंगी नहीं पता लेकिन लौटाऊंगी जरुर".




"तुम भी हद्द करती हो यार , उधार की बात ही कहाँ से आई."




"नहीं सुब्बू अगर तुम वापस नहीं लोगे तो मुझे नहीं चाहिए."




प्रीत की गहरी खामोश आवाज़ सुन कर सुब्बू धीरे से " ठीक है" ही कह सका.

.सुब्बू से विदा ले नोटों को मुट्ठी में दबाये प्रीत ऑटो में बैठ गई,

सुब्बू चुप-चाप उसे जाता हुआ देखता रहा, उसे प्रीत की आदत पता है वो कभी

पलट कर नहीं देखती , कोई उसे विदा करने के लिए खड़ा है ये जानते हुए भी नहीं।

बंद मुट्ठी को सीने से लगाये प्रीत ईश्वर से प्रार्थना करना चाहती थी

लेकिन क्या बोले वो ईश्वर से , क्या चाहती है वो , प्रीत को कुछ समझ नहीं आ रहा था।  दरवाज़े का ताला खोलने से पहले प्रीत ठिठक गई, ये घर उसका ही है इस बात का यकीन खुद को दिलाना बहुत

जरुरी हो गया था।  गहरी साँस के साथ   एक बार मुट्ठी में दबे रुपयों की ओर देखा और

ताला खोल अन्दर आ गई. उसे कल की तैयारी करनी थी, कल रोहन आ रहा था.




*****

"उन रुपयों की क्या.....". उसकी ठंडी निगाहों ने मेरे शब्दों को तालू में

ही जमा दिया. हम दोनों को ही संभलने में दो पल का वक़्त लगा और फिर वो

मुझे खींच ले गई अपने शब्दों से से रोहन और प्रीत के घर में.




*****







"क्या बात है! गजब ढा रही हो आज तो" रोहन ने दरवाज़ा खुलते ही कहा.




आज प्रीत ने बहुत वक़्त दिया था रोहन की पसंद को, रोहन की पसंद की सुनहरे

किनारे वाली हल्की नीली साड़ी, खुले बाल , हाथ भर चूड़ियां, कमर में लटकता

बड़ा सा चाबी का गुच्छा, उसकी पसंद का श्रृंगार, रोहन की एक-एक पसंद का

ध्यान रखा था आज प्रीत ने .रोहन की तारीफ से मुस्कुरा उठी प्रीत .




"कैसा रहा तुम्हारा टूर , चाय लाऊं? हाथ मुंह धो लो , थक गए होगे न, कितनी सारी बातें

एक ही सांस में कह गई प्रीत , लगा पानी में दूर-दूर पड़े पत्थरों पर पैर

रख पार कर रही है .




"हाँ भई चाय तो पिला ही दो थक गया हूँ"




"अभी लाई"




" और सुनाओ क्या किया तुमने इन चार दिनों में"




"कुछ ख़ास नहीं , एक मिनट अभी आई" कहती हुई प्रीत तुरंत ही लौट भी आई।  चाय के प्याले के साथ प्रीत ने ३००० रुपये रोहन को पकडाते हुए कहा " ये लो मेरी तीन रातों की कमाई"




"मतलब क्या है तुम्हारा , क्या बोल रही हो तुम पता भी है तुम्हे" , अवाक रह गया रोहन। 




"सही सुना है तुमने , मेरी तीन रातों की कमाई" , प्रीत सपाट चेहरा लिए हुए कह रही थी।  लम्हा भर पहले की प्रीत रोहन को सदियों पुरानी बात लग रही थी।  प्रीत के आगे बढे हुए हाथ में रुपये थे , उन रुपयों से ज्यादा प्रीत का चेहरा रोहन को कंपकंपा रहा था।

"अगर ये मज़ाक है तो बहुत ही भद्दा मजाक है ये प्रीत" , रोहन ने गुस्सा करने की भरसक कोशिश की लेकिन अजाने डर ने उसे पकड़ लिया।

"नहीं, कोई मजाक नहीं , तुमने ही तो उस दिन कहा था" प्रीत का स्वर अभी भी शांत था .




"क्या कहा था , कब कहा था , कहना क्या चाहती हो तुम"




"एनिवर्सरी वाली रात तुमने ही तो कहा था की मैं बिस्तर में ऐसी हूँ की एक

रात के पांच रुपये भी नहीं कमा सकती"




"वो तो मैंने यूँ ही मजाक में ..... " स्तब्ध बैठा रह गया रोहन। अपनी आवाज़ रोहन खुद ही नहीं पहचान पा रहा था।

प्रीत ने चाय के बिखरे कप के टुकड़े समेटे और रोहन को अनसुना कर पलट गई .

किचन तक जाते हुए उसके अधरों पर एक नन्ही सी भीगी मुस्कान थी.




मैं भी तो स्तब्ध बैठी रह गई थी, ये किस्सा था? कॉफ़ी की गर्माहट भी

हथेलियों में जमी बर्फ पिघला नहीं पा रही थी .

वो मुस्कुरा उठी," चलती हूँ" उसने खड़े होते हुए कहा




"तो क्या इसीलिए अब आप कोई श्रृंगार कोई जेवर नहीं पहनती" , पूछते ही लगा

क्या बचकाना सवाल था, कहीं मैं उसके ज़ख्म तो नहीं कुरेद रही थी .




वो हँस पड़ी, कैसी विलक्षण हंसी थी, अगर गौरा पन्त ने सुनी होती वो हंसी तो शायद उन्हें भी सोचना पड़ जाता उस हंसी को चित्रित करने में. कुछ कुछ उगते सूरज में अध्यात्म में डूबी चिड़िया की आवाज़ जैसा? नहीं, कुछ और ही था उस हंसी में. जिन्होंने गंगा किनारे भोर में पंडित शिव कुमार शर्मा का

संतूर और हरी प्रसाद चौरसिया जी की बांसुरी सामने बैठ के सुनी है वही समझ

सकते हैं उस हँसी को .




अरे! नहीं, नहीं मेरे महबूब का कहना है की मेरी खूबसूरती को जेवरों की जरुरत

नहीं", हँसी के बीच ही उसने कहा.




"महबूब ? मतलब ये घटना ...." मेरा सवाल उसकी साँस भर- भर ली जाती हुई हँसी में अधूरा ही रह गया.




"मतलब का तो कुछ नहीं पता" कहते हुए रहस्यमई मुस्कान ओढ़े वो चली गई और मैं बस उसे

जाता देखती रही, जानती थी वो मुड कर नहीं देखेगी , बस जानती थी, कैसे

जानती थी पता नहीं.

*******




उस सड़क पर कम ही जाना होता है लेकिन जब भी कैफ़े कॉफ़ी डे के आगे से निकलती

हूँ तो अन्दर झाँकने का लोभ संवरण नहीं कर पाती, शायद वो मुझे एक बार फिर

मिल जाए और अबकी बार मिली तो उसका नाम जरुर पूछूंगी.

























( painting Australian artist Loui Jover की है)

Friday, 15 August 2014

सारे बंधन जो मैंने जाने अनजाने जोड़े

या

जो जोड़ दिए गए मुझसे ,

अब उनसे मुक्ति चाहती हूँ ,

न कहीं जाने की इच्छा है
...

न कहीं खुद को पहुँचाने की उतावली,

न तुमसे जुड़ने के अंतहीन इंतज़ार का इंतज़ार है,

न ही कोई रस्ता तलाशना है की पहुँच सको तुम मुझ तक ,

मुक्त होना है

जलते कोयलों पर चलने की प्यास से,

तलवे की आंच माथे तक पहुंचा ,

सारी शिकनों को फूंक डालना है,

मुझे भी आज़ाद होना है .
 
 
 
 
 
आप सभी को आज़ादी की बधाई!!!!

Tuesday, 12 August 2014

दरवाज़े से टिक कर खड़ी वो महबूब का रस्ता देखती रहती थी, इंतज़ार की सारी सतरें चुन लेने के बाद भी जब कुछ न बुना जाता तो वो गहरी सांस ले पलट जाती लेकिन उसके कान बाहर रस्ते पर ही अटक जाते, हवा भी गुजरती तो वह उम्मीद की एडियों के बल घूम जाती और इस लायक भी न रह पाती की अपने आंसुओं की गर्मी महसूस कर सके . गेट के बाहर सड़क किनारे लगे पेड़ आपस में भले ही कभी न बोलतें हों लेकिन उसकी इस हालत पर सारे पेड़ों की सारी पत्तियाँ खिल-खिल हँस पड़ती और उनके हँसते ही बारिश की जमा बूंदों को नीचे धरती पर कूदने के हज़ारों-हज़ार बहाने मिल जाते. अपनी एक शिकायत जो उसने मुट्ठी में दबा रक्खी थी सोचती की पत्तों पर लिख कर उड़ा दे या अंतस में गहरे कंही दबा ले.
                                                                                      अपना  चश्मा उतार मैंने  अपनी कनपटियाँ दबाते हुए डायरी बंद कर दी . मैं  हमेशा ही कहानी लिखना चाहती हूँ और बैठती भी हूँ  कहानी ही लिखने लेकिन हर बार अपना मन डायरी पे लिख उठ जाती हूँ  . पता नहीं इस बार भी मुझसे  ये कहानी लिखी जा पाएगी या नहीं.


( शायद कभी दरवाज़े पे  या किसी गली किसी सड़क पर इस कहानी से  मुलाकात हो ही जाए तब तक सिर्फ इंतज़ार.)

Sunday, 3 August 2014



कई दिनों बाद मिले थे वो !

उन दोनों ने ही अपने बिज़ी शेड्यूल मे से आज का फ्री वक़्त एक – दूसरे के नाम किया था ।

अब दोनों साथ-साथ थे , बे-मक़सद से सड़कों पर घूमते हुये ।

एक दूसरे का हाल चाल पूछने के बाद मौन पसरा था ।

लड़की के बाल शाम की ठंडी हवा से उड़ – उड़ कर उसे थोड़ा तंग कर रहे थे ।

लड़का अपनी सिगरेट को ख़त्म होता हुआ देख रहा था ।

“ शहर में ट्रेफ़िक कितना बढ़ गया है ना ?बे-हिसाब गाडियाँ हैं ! “




लड़की का जवाब वो सुन नहीं पाया ।


कुछ देर की चुप्पी को समेट लड़की ने कहा “ ठंड बढ़ गयी है ! “

लड़के का जवाब लड़की के कानों तक नहीं पहुँचा।

जब दो बेहद परिचित लोग , शहर के ट्रेफ़िक और मौसम की बात करें तो उन्हे कुछ सोचना ज़रूर ही चाहिए !

Saturday, 2 August 2014

चलो एक बार फिर से
आरम्भ का आरम्भ करते हैं,
तुम उसी तरह हाथों में चश्मा हिलाते हुए मुझसे बात करना
और
मैं बिलकुल उसी जगह ठुड्डी पे हाथ रक्खे सुनुगी,
चादर का कोना सीधा करते हुए देना तुम कुछ हिदायतें ,
सर हिला कर मौन सहमती दूँगी मैं,
तुम देखना एक बार वैसे ही नज़र उठा कर मेरी हिलती गर्दन को,
और
मैं एक बारगी फिर अटक जाउंगी तुम्हारी गहरी आँखों में, ...
एक बार फिर से साझा कर लेते हैं
शादी और निभाए जा सकने वाले संबंधों की चिंता को,
इस दोपहरी तुम्हे आराम कुर्सी पर सोता देख कर ,
गढ़ी हुई सारी परिभाषाओं को ताक पर रख कर
एक बार फिर से ,
सिर्फ और सिर्फ
तुम्हारी बेटी होना चाहती हूँ.

Sunday, 20 July 2014

गढ़ लेना यथार्थ
सपनो की दुनिया में,

रख आना एक दिया
जलने की प्रतीक्षा में
सच और ख्वाब की मुडती सी गली में,

स्मृतियों को गलबहियां डाल
मनुहार करना न लौटने की,

देखना मुस्कुराहटों का
टूट-टूट कर आना,

लफ़्ज़ों के साए पकड़ना
खुलती मुट्ठियों से,

उसके खामोश होने से पहले तुम्हे होना चाहिए था.

Sunday, 13 July 2014

मिले थे कुछ जवाब
अर्थहीन शब्दों की आड़
लिए हुए,

ढूंढें न मिला
एक भी सिरा
उँगलियों पर गिने जा सकने
वाले सवालों का,...

इन सवालों के बीच ही
छुपी थी कहीं
एक शिकायत
मुझे कुतरती हुई सी,

दिख जाए तो बेहद ख़ास
नज़र चूक जाये तो
न जानी न कही

मुझे तो सिर्फ अपनी दूरी का अंदाजा लेना था की कहाँ से दीवार पर मारी हुई गेंद वापस आती है-----मेरी मुठ्ठियों में

Saturday, 12 July 2014

                                सीली लकड़ियों का धुआँ

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                                 पार्ट-1

 वो कल रात ही यहाँ आई थी अपने पति और बच्चो के साथ, पहाड़ों से उतर मैदानी इलाके में जाने के लिए. कुछ घंटों का सफ़र तय कर चुकी थी और आगे के सफ़र के लिए उसे यहाँ से ट्रेन में बैठना था. कल रात ही वो यहाँ पहुंची थी, पहुंचते ही उसने मोमोज़ का डिब्बा निकाल कर बाहर रक्खा, उसे डर था कहीं मोमोज़ खराब न हो जाए. किसी एक आबो-हवा की चीज़ दूसरी जगह जाकर कितने वक़्त जिंदा रह पाएगी जैसे सवाल उसे हैरान करने के लिए आजकल  काफी होते, वो अपनी तईं कोशिश कर रही थी इन छोटे-छोटे सवालों में खुद को उलझा लेने की. पांच महीनो से वो एक फोन कॉल, एक चिट्ठी का इंतज़ार कर रही थी, कल दिन भर में  उसका फोन कई बार बजा था , हर बार नंबर एक ही था, वो पहचानती नहीं थी उस नंबर को फिर भी उसे पता था की वो जानती है की कौन उसे बार-बार फोन कर रहा है , पिछले  पांच महीनो में अपनी आँखों को सूखा रखने में वो अपनी सारी  हिम्मत खर्च कर चुकी थी अब उसमे हिम्मत नहीं थी फोन उठाने की. जब उसके पति ने कई बार कहा की वो फोन उठाती क्यूँ नहीं तो उसने फोन साइलेंट पर कर दिया. रात भर उसे खटका लगा रहा कि कहीं फोन तो नहीं बज रहा, अजीब सी कैफियत तारी रही उस पर. जिस बात के होने का इंतज़ार उसने हमेशा किया वो तो हुई नहीं अलबत्ता उसी बात के रस्ते से गुज़र दूसरी बात हुआ  होना चाहती है और वो उसे मंज़ूर या नामंज़ूर करने की हालत में भी नहीं.


                                                                           ***
अल्ह सुबह  उसने बाहर निकलने के लिए  कमरे का दरवाज़ा खोला, अभी उसके दोनों हाथों ने उन किवाड़ों को छोड़ा भी नहीं था जिन्होंने उसे अन्दर छुपने का रास्ता दिया था कि फिर से हाथों ने उन किवाड़ो पर अपनी पकड़ मज़बूत कर ली, सामने नजारा ही कुछ ऐसा था, कमरे के दरवाज़े के बाहर एक पतला सा गलियारा था जो इस लाइन में बने हर कमरे के सामने से गुज़रता था, गलियारे से लगी हुई दीवार की मुंडेर पर एक काली-भूरी चिड़िया बैठी थी. उसके दरवाज़ा खोलते ही  चिड़िया चिहुंक कर उड़ी और जोर की आवाज़ निकालते  हुए उसके पास से उड़ कर ऊपर आसमान में खो गई.चिड़िया की बोली से बनी खबर सुन  वो हदस गई, उसकी नज़रों ने भी हिम्मत नहीं की उस पंछी का पीछा करने की, उसके पैर जवाब दे गए और वो वहीँ देहरी पर बैठ गई. इतनी पास से देखना इस काली-भूरी चिड़िया को,हे! भगवन अब क्या अनहोनी होनी बची है , उसने जल्दी-जल्दी दुर्गा चालीसा की जितनी भी पंक्तियाँ याद थी पढ़ डाली,  इस  चिड़िया का नाम उसे कभी भी पता नहीं था न ही उसने कभी पता करने की जरुरत समझी. वो अन्धविश्वासी कतई नहीं है, पढ़ी-लिखी समझदार है, समाज में रुतबा है, पति बच्चो को सवांरती आई है इतने सालो से, इस चिड़िया को देखना एक विश्वास है जो उसके अन्दर बचपन से पला है, जब उसे ये चिड़िया जोड़े में दिखती है तो उसके अन्दर झरना फूट पड़ता है कि आज जरूर कुछ अच्छा होना है या कोई अच्छी खबर मिलनी है, और जब यही चिड़िया अपने जोड़े से अलग अकेली दिखे तो उसका मन बैठ-बैठ जाता है कुछ बुरा होने की आशंका से. आज क्या अनहोनी होनी थी, चिड़िया की लाइ खबर हमेशा पूरी होती है बस उसकी तैयारी अधूरी रह जाती है हमेशा ही. इंतज़ार की वो चिट्ठी तो आई नहीं जिस पर बीते दिनों की गर्माहट होती उल्टा ईश्वर उसे चेता जरुर गया था आने वाले धक्के से.हाँ! वो इसे ईश्वर की भेजी  चिट्ठी की ही तरह देखती थी, उसके इस विश्वास ने उससे कभी विश्वासघात न किया था.

                                                                                                                 उसके पति ने झुंझलाते हुए कहा -"चलो भई जल्दी करो , सामान निकालो , बच्चे तैयार हो गए ? निगाहें शर्ट स्लीव के बटन पर जमी हुई, उसके पति को जब तक हाथ पकड़ कर ना दिखाया जाए उन्हें कुछ नहीं दिखता, उसके दूध-केसर सी रंगत वाले चेहरे पर जब उनका ध्यान नहीं जाता तो पसीना-पसीना ज़र्द चेहरे पर क्या जाता.

                                                                                                        उसने बच्चो को नरमी से पुकार सामान बाहर करने और चलने के लिए कहा, उसने बच्चो को निहारा वो फूल-फूल उठती, एक ही पल में औरत से सिर्फ  माँ हो उठती, उसके बच्चे जो किसी भी गहरे से गहरे घाव पर मरहम हो सकने लायक थे, अब तो दोनों  बेटे अपने पिता से ऊँचे निकल रहे थे. उसने अपने पति को देखा वो औरत से बीवी भी होना चाहती थी उसने एक नीम सी  मुस्कराहट से इस ख्याल को झिड़क दिया और पूरी की पूरी एक दुनियादार औरत हो गई.

                                                                           ****
कुनमुनाती धूप वाले दिनों के वो कुछ आखिरी बचे हुए दिन थे, उन्ही दिनों में से किसी एक दिन उसे चिट्ठी मिली थी जिसमे सिर्फ इतना ही लिखा था
"मैं आ रहा हूँ , तीन दिन रुकुंगा "
उन तीन दिनों की तारीख  भी लिखी थी, कोई नाम नहीं था न ही उसे नाम की दरकार थी, इस लिखावट को वो बंद आँख भी पहचान सकती थी, लफ़्ज़ों में भी गंध होती है और ये लफ्ज़ तो खुशबुओं का वो जंगल ले आये थे जिसमे वो डूबती उतराती रही थी. लिफाफा हाथ में ले वो सन्न बैठी रह गई थी, उसे पता नहीं था कब आया ये लिफाफा, नौकरानी ने करीने से सारी चिट्ठियों के साथ इसे भी मेज़ के बीच में रख दिया था, उसकी पढने की मेज़-कुर्सी खिड़की से थोडा हट के कमरे के एक कोने में थी, गर्दन को थोडा बाईं ओर घुमाते ही वो खिड़की से बाहर सड़क देख सकती थी, रात में इसी खिड़की से उसे जुगनू दिखते और बागीचे में लगे फूलों और स्ट्रॉबेरी की महक अन्दर आती, दिन में वो देवदार के ऊंचे-ऊंचे पेड़ो को निहारती. एक बार इन्ही ऊंचे पेड़ो पर उसके बेटे का हैलीकॉप्टर अटक गया था, इन नन्हे बेशकीमती पलों को उसने इसी खिड़की पर संजोया था लेकिन आज उसे कुछ नज़र नहीं आ रहा था, आज इस लम्हा वो सुन्न सी कुर्सी पर बैठी थी, उसकी सारी इन्द्रियाँ आँख बन उन चंद हर्फों को देख रही थी, उसने फोन का रिसीवर उठाया और कान से लगा कर बैठी रही, नहीं आज नहीं उन तारीखों वाले दिन ही फोन करेगी. इस ख़त को देख कितने सारे ठन्डे-गर्म ख्याल आये-गए बस एक ख्याल रुका रहा कि वेद ने उसका पता अभी तक संभाल कर रखा है, उसे लगा वो गुनगुने से पानी में डूब रही है, साँसों के तार जब कसने लगे तो वो चिहुंक कर खड़ी हो गई, कुर्सी गिरने की आवाज़ से नौकरानी दौड़ी आई, नौकरानी क्या कह रही थी उसे कुछ सुनाई नहीं दिया, उस दिन घर में चलते हुए वो दो बार दीवारों से टकरा गई, उसकी आँखें उन तारीखों के साथ लिफाफे में बंद थी. उसने गले में पड़े दुपट्टे के बाएँ कोने में एक गिरह लगाईं और दाएं कोने से एक गाँठ खोल दी.
                           इस बरस उसकी शादी को अट्ठारह साल हो जायेंगे, सब कहते हैं ये साल ख़ास है अब उसे भी लगता है ख़ास है ये साल.
                                                                         (  आगे की कहानी अगले कुछ दिनों में ---)