Sunday, 17 May 2015

अन्दर का मौसन जब ठंडा लगता है, स्नो फ्लेक की तरह गिरती हुई ठण्ड नहीं बल्कि जमी हुईं ठण्ड , एक दुसरे कंधे आपस में छूते हैं फिर भी बीच में पसरी हुई ठण्ड पिघल नहीं पाती तो बाहर निकल के खड़ी हो जाती हूँ. चलती ट्रेन के दरवाज़े पे खडा होना , एक अजीब सी तसल्ली से भर देता है. अन्दर सब कुछ कितना सुकून भरा है, सुकून की कहीं कुछ भी नहीं बदलेगा, आज जो है कल भी बिलकुल इसी शक्लो-सूरत में दिखाई देगा , पूरी दुनिया जैसे एक बंद कमरे में सिमटी हुई, आरामदेह लेकिन बंद , लेकिन बाहर दरवाज़े पे खड़ा होना जीवन जीने जैसा लगता है, सर्द और गर्म के बीच में झूलने जैसा. ट्रेन की गति धीमी होती है अब वो धीरे धीरे सरक रही है, सामने से एक और ट्रेन गुज़रती है, मानो इससे मिलने के लिए ही गति कम की गई हो, सामने तुम दिखते हो, उसी तरह पायदान के ऊपरी हिस्से पे खड़े हुए, तुम उदासीन नज़रों से देखते हो मेरी तरफ , लगता है जैसे सिर्फ तुम्हारी आँखों ने देखा निगाहों ने नहीं, मैं एकटक देखती हूँ तुम्हे, तुम आँखें फेरते हो, हवा में तुम्हारे बाल कोई गीत गुनगुना उठते हैं, अचानक कोई भूली बिसरी याद तुम्हारे माथे उतरती है और तुम पलट कर पहचानी हुई निगाहों से मेरी तरफ देखते हो लेकिन तब तक दोनों ट्रेन्स एक दूसरे को लगभग पार कर चुकती है , मैं परेशान नहीं होती, यही तो ज़िन्दगी है, जब तक पहचाना हम अलग हो चुके होते है, क्या फर्क पड़ता है, फिर मिलेंगे किसी मोड़ पर किसी तिराहे पर, ये पटरियां यूँ ही बिछी रहेंगी और उन पर ये ट्रेन्स भी हमें लिए यूँ ही दौड़ती रहेंगी, फिर जब कभी हम एक दूसरे के सामने से गुजरेंगे तो आँख भर जी लेंगे एक दूसरे को, सब्र है मुझमे बहुत.

Saturday, 2 May 2015








एक किस्सा सुनो, सच कहूँगी तो तुम इसे दिल से लगा बैठोगे इसलिए इसे किस्से की तरह सुनना. ये वो किस्सा है जिसे बस यूँ ही न सुना जा सकता है न सुनाया जा सकता है. इसे तो बस नीम तले बैठ के सुना जा सकता है. कहीं और इसलिए नहीं क्यूंकि अलाव के सामने बैठ कर सुनी हुई कहानियाँ एक अलग रंग के ऐसे छोर तक ले जाती हैं जहाँ से लौटने का रास्ता नज़रों में नहीं आता . सिर्फ नीम तले इसलिए कि जब नीम की ठंडी हवाएं तुम्हारी आँखें मूँदने की कोशिश करें तो नीम पर बैठी हर चिड़िया अपने गीतों से तुम्हे ऐसा करने नहीं देगी और जब तुम अपनी उँगलियाँ होंठों पर रख मुस्कुरा उठोगे तो नीम से धरती तक और धरती से नीम की डालियों तक दौड़ लगाती गिलहरियों की पीठ पर खूबसूरत रेखाएँ खिंच जायेंगी. इसे किसी आम या ख़ास कहानी की तरह न सुन लेना. एक प्रेम कहानी को सुनने के लिए और सुनाने के लिए क्या चाहिए आज तक कोई तय नहीं कर पाया बस इसे जागती आँखों सुनना.


कहते हैं इस किस्से की लड़की को, पिछली हर सदी में जन्मी ऐसी लड़कियों ने जिन्होंने कभी मुहब्बत नहीं की थी और बीते और आने वाले हर समय की ऐसी लड़कियों ने भी जिन्होंने टूट कट मुहब्बत की थी, वरदान दिया था की वो इस धरती पर आने वाली हर लड़की के दिल में थोड़ी सी हमेशा बची रहेगी.



इस कहानी में एक लड़की थी जैसी हर कहानी में होती है. और वो हर कहानी में मिलने वाली लड़की की तरह सुन्दर भी थी लेकिन बस बाकी हर कहानी से इतनी ही मिलती थी वो. एक चुप्पा सी लड़की जो आँखों से भी नहीं बोलती थी . उसकी सदा झुकी रहने वाली आँखों ने जाने कौन सी भाषा में लिखे महाकाव्य समेट रखे थे. रोज़मर्रा के मामलों में ज़िन्दगी को पटरी पर बैठाने  में जुटे लोगों के पास न तो इतनी फुर्सत थी और न ही कुव्वत की आठवें रंग की रौशनाई में डूबे उस प्राणवायु से महाकाव्य में दिलचस्पी लेते. वो लड़की गाने नहीं गाती थी बस उस समन्दर किनारे बैठ बांसुरी जरुर बजाया करती थी जिसके पानी में उसने कभी पैर नहीं डुबोए थे जैसा की उसके देस की बाकी लडकियां किया करती थी.उसकी बांसुरी की मद्धम, कहीं पहुँचने को आतुर आवाज़ किनारे पसरी हुई चट्टानों पर सोती हुई पानी की कुछ छोटी और कुछ बड़ी बूँदें  सुनती और उस आवाज़ को समेट चट्टानों से कूद  दूर-दूर देस पहुँचाने का जिम्मा लिए हुए  समंदर में मिल जाती.  उसके देस की लडकियाँ नज़रों से खो जाने तक की दूर किसी चट्टान पर बैठ कर जब अपने पैरों को लहरों में डुबोती थीं तो छोटी-छोटी मछलियाँ आ कर उनकी पाज़ेबों के घुंघरुओं को हँसा देती.  उस देस की जवान होती लडकियाँ जब एक दुसरे के कानों में फुसफुसा के खिल-खिल खिलखिला रही होतीं तब वो पैर के नाखूनों से मिट्टी कुरेदती जाने क्या और जाने कौन सा रंग तलाशा करती. उसकी सहेलियाँ जब सजने- सँवरने के नुस्खे एक-दूसरे को बताया करती ठीक तभी उसी वक़्त जाने कहाँ से लाल चीटियाँ आ कर उससे चिपट जाती और वो उन्हें मारने में अपने कान कहीं गिरवी रख आती.

         पान की महक को बेहद पसंद करने वाली उस लड़की के गालों को उसके कान में पड़े बड़े-बड़े झुमके अक्सर छेड़ जाते जिन्हें कभी किसी लड़के ने महबूब बन कर छुआ  नहीं था. लड़की उन झुमकों की इस हरकत का अक्स हवा में निहारती और उसकी बाँसुरी के स्वर तेज़ गति से धड़कने लगते. रोज़मर्रा के दिनों  जैसे एक दिन जब लड़की समंदर किनारे बैठी बाँसुरी की तान को लहरों में गूँथने में मगन थी तब , जब दिन ढला नहीं था और न ही ढलने को आतुर था. उस देस ऊंची-ऊंची दीवारें नहीं थीं के उचक कर, टेढ़े-मेढ़े हो कर सूरज को देखना पड़े. कहीं पहुँचने की जल्दी किये बिना  धीमी चाल से चलते हुए हवा भी आते-जाते लोगों को निहार रही थी. तभी हवा के साथ बहुत सारे लोगों ने उसे आते देखा, लगा जैसे सूरज को सर पर रख कर ला रहा हो. लोगों ने आँखों को ऊँगलियों की ओट में कर लिया फिर भी वो उसे पहचान नहीं पाए.
                                                                                          जाने कौन था, जाने कहाँ से आया था, किसी दूर देस का राजकुमार तो बिलकुल भी नहीं लगता था. उसकी पहचान के बारे में इतने कयास लगे की आवाजें थक कर निढाल हो गई. बालों की एक लट उसके माथे झूला करती थी जिसे वो अपनी हंसी से पीछे झटक दिया करता था, जब वो लड़का हँसता था तो उसकी गोल-गोल हँसी सुनने वाले को लट्टू सा नचा दिया करती थी.
                                                                                                                  किसी ने गले के कागा को दो ऊँगलियों से पकड़ दावा किया कि ये लड़का उस जहाज़ से आया है जो नीले-हरे पानी में डूबे पत्थरों के हुजूम से टकरा कर टेढ़ा सा  हो गया है. धीमी आवाज़ में कसमे खाने वालो ने तो यहाँ तक सरगोशियाँ की कि उन्होंने उस जहाज़ के ऊपर छोटे-छोटे सुरमई रंग के परिंदों को चक्कर लगाते देखा है. वो लड़का सुनता, सुनता रहता 


सदियाँ गुज़र चुकीं
और
अभी न जाने कितनी सदियाँ गुज़ारनी हैं,
निहारते हुए
तुम्हारी मुस्कुराती आँखों  को,...
जो झांकती हैं दीवार पर टंगे एक फ्रेम में से,
तुम्हारी कुछ आदतो के साथ
मेरा झगड़ा अब भी वैसा ही है
फिर भी
अपनी हज़ार न- नुकुर के बाद भी
एक हाथ से ज़मीन पोंछ,
दुसरे हाथ से तुम्हारी चप्पलें
वहीँ रख देती हूँ, दरवाज़े के उसी एक कोने में
सच के साथ तालमेल बिठाना सीख लिया है अब
तुम्हारा नहीं होना स्वीकारा है मैंने
बाहों पर तैरती तुम्हारी गुनगुनाहट
और
उँगलियों में उलझी तुम्हारी आदतों के साथ
तुमने अपने वादे नहीं लौटाए
और
मैंने अपनी हथेलियाँ नहीं सिकोड़ी
कहीं कोई सन्नाटा नहीं
कहीं कोई आहट नहीं
कोई शिकायत भी नहीं
लेकिन
तुम ही कहो तो
ऐसे भी भला कोई जाता है बिना बताये!!!