गंगा किनारे
सीडियों पे बैठ
एक दुसरे का हाथ थामे
सूर्योदय देखना
जानती हूँ
तुम्हे अब भी याद है
गलियों-गलियों चुप-चाप
उंगलियाँ छूते
कदम गिनते हुए
वापस लौटना
जानती हूँ
तुम्हे अब भी याद है
कमरे में बिखरे पड़े
मेरे शब्दों को
उठाकर पन्नो में सहेजना
जानती हूँ
तुम्हे अब भी याद है
सोचती हूँ ……
क्या ये सब
मुझे भी याद है!!!
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