Wednesday, 11 June 2025

 # 12.12: द डे – इतिहास की धड़कनों पर चलता एक विवेकपूर्ण सिनेमाई लेखा


निर्देशक: किम सुंग-सू

मुख्य कलाकार: ह्वांग जुंग-मिन, जुंग वू-सुंग, ली सुंग-मिन, पार्क हे-जून, किम सुंग-क्युन


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## अंधकार में आशंका, और आशंका में क्रांति


फिल्म 12.12: द डे  केवल एक सैन्य तख्तापलट की कथा नहीं है, बल्कि यह उस समय का दस्तावेज़ है जब एक राष्ट्र अपने भविष्य के सबसे नाजुक मोड़ पर खड़ा था। दिसंबर 1979 की वह रात, जब कोरिया की राजनीति ने करवट ली, निर्देशक किम सुंग-सू की दृष्टि में जीवंत हो उठती है — जैसे कोई पुराना, धूल सना दस्तावेज़ अचानक आपके सामने खुल जाए।


राष्ट्रपति पार्क चुंग-ही की हत्या के बाद राजनीतिक अस्थिरता ने कोरिया को झकझोर दिया। इस शून्य में, सत्ता को हथियाने और बचाने की दौड़ शुरू होती है। यह दौड़ सिर्फ बंदूकधारियों की नहीं, आत्मा और विवेक की भी है।




## पात्र नहीं, प्रतीक बनते हैं किरदार


ह्वांग जुंग-मिन द्वारा निभाया गया मेजर जनरल चुन डू-ग्वांग सत्ता का भूखा व्यक्ति नहीं, बल्कि इतिहास को अपने अनुसार मोड़ने का स्वप्न देखने वाला है। उसकी आंखों में सत्ता है, पर आत्मा में अनिश्चितता की लपटें। वहीं जुंग वू-सुंग का ली ताए-शिन मानो युद्ध के बीच एक मोमबत्ती है — टिमटिमाती हुई , पर अपनी रोशनी न खोती हुई ।


इन दोनों के बीच टकराव केवल विचारों का नहीं, बल्कि भविष्य की शक्ल का है। सहायक कलाकारों की उपस्थिति भी केवल भूमिका नहीं निभाती — वे समय की नब्ज़ बन जाते हैं।




## निर्देशन और दृश्य-नियोजन में सूक्ष्मता


किम सुंग-सू कैमरे से चिल्लाते नहीं, फुसफुसाते हैं। उनकी शैली तेज नहीं, धीरे-धीरे आत्मा में उतरने वाली है। दृश्य इतने सघन हैं कि हर कमरे की दीवार, हर रेडियो की खामोशी, एक अदृश्य संवाद बन जाती है।


एक ही रात में घटने वाली कहानी को वे इतनी परतों में कहते हैं कि दर्शक कहीं खोता नहीं , बल्कि भीतर की ओर उतरता  चला जाता है।


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## ध्वनि जो मौन को मुखर बनाती है


फिल्म में संगीत कोई पार्श्वभूमि नहीं, आत्मा का स्पंदन बन जाता है। न गूंज है, न शोर — केवल वह मौन है जो युद्ध से पहले की नब्ज़ जैसा प्रतीत होता है। पैरों की आहट, टेलीफोन की घंटी, और रेडियो की दरारें — सब मिलकर एक अदृश्य भय रचती हैं।


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## समय और सीमाओं से परे एक दृष्टिकोण


यह फिल्म कोरियन राजनीति की बात करती है, लेकिन विषय कहीं अधिक व्यापक हैं। यह बताती है कि सत्ता का संघर्ष केवल नेताओं के बीच नहीं, बल्कि उस चेतना के बीच है जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं। जब सैनिक सोचने लगें कि वे शासन के योग्य हैं, तब संकट सिर उठाता है — यही चेतावनी यह फिल्म देती है।


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## निष्कर्ष: एक विवेकपूर्ण युद्धगाथा


12.12: द डे को केवल थ्रिलर कहना उसके साथ अन्याय होगा। यह फिल्म एक दर्पण है — जो सत्ता की भूख, नैतिक दुविधा और इतिहास के अनकहे क्षणों को प्रतिबिंबित करती है।


इसमें विस्फोट नहीं हैं, पर विचार हैं। इसमें नायक-खलनायक की स्पष्ट रेखाएं नहीं, बल्कि धुंधली सीमाएं हैं — जहां निर्णय लेना ही युद्ध बन जाता है।


रेटिंग: 9/10

यदि आपने Argo या Munich जैसी फिल्में पसंद की हों — तो यह आपकी सूची में अवश्य होनी चाहिए।


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क्या आपको यह फिल्म देखनी चाहिए?

यदि आप केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सिनेमा से संवाद करना चाहते हैं — तो हाँ, यह फिल्म आपके लिए है।


 

The Darjeeling Limited – A Whimsical Journey Through Grief, Brotherhood, and Indian Railways

Directed by Wes Anderson | Starring Owen Wilson, Adrien Brody, Jason Schwartzman

A Spiritual Journey That’s More Than a Train Ride

Wes Anderson’s The Darjeeling Limited (2007) isn’t just a film — it’s an experience. Set almost entirely on a train weaving through the vast, chaotic, and vibrant landscapes of India, the film follows three estranged brothers as they attempt to reconnect after the death of their father. While the premise sounds simple, Anderson’s storytelling — rich with symbolism, aesthetic mastery, and emotional nuance — takes it far beyond a typical road trip movie.

From the very first frame, Anderson's signature style is unmistakable — pastel color palettes, symmetrical shots, quirky props, and background music that almost becomes its own character. But under that trademark visual charm lies a deeply moving story about loss, emotional baggage (literal and metaphorical), and the awkward beauty of healing.

The Plot (Spoiler-Free)

Three brothers — Francis (Owen Wilson), Peter (Adrien Brody), and Jack (Jason Schwartzman) — haven’t spoken in a year. Francis, the eldest and most controlling, invites them on a train journey through India, claiming it’s a "spiritual journey" designed to bring them back together and help them find themselves. They travel aboard the Darjeeling Limited, a train as whimsical and unpredictable as their own personalities.

The journey starts with rituals, arguments, passive-aggressive power plays, and endless misunderstandings — but slowly evolves into something more introspective and tender. Each brother carries his own kind of grief and confusion, and Anderson lets that emotional weight unfold with grace and subtlety.

Performances That Resonate

The chemistry between Wilson, Brody, and Schwartzman is so natural that you’ll forget you’re watching actors. Owen Wilson plays Francis with a forced optimism that clearly masks his emotional instability. Adrien Brody, as Peter, is perhaps the most emotionally raw of the three. Jason Schwartzman’s Jack is the youngest — a moody writer who romanticizes pain and drowns in heartbreak. Together, they don’t just play siblings — they feel like siblings: loving, petty, selfish, generous, annoying, and irreplaceable.

India As a Living, Breathing Character

Few Western films showcase India with the kind of respect and nuance that The Darjeeling Limited does. India is not used as a backdrop — it is woven into the narrative. From bustling train stations to quiet village rituals, Anderson captures the chaos and calm of the country with genuine fascination. The characters aren’t there to save India, nor does India exist to save them. It's a mutual presence — observing, challenging, and changing them without even trying.

Music, Color, and Detail: Classic Wes Anderson

The film is layered with musical gems — from Indian scores by Satyajit Ray’s films to Western rock classics like “This Time Tomorrow” by The Kinks. The soundtrack never feels out of place — it dances with the visuals and deepens the narrative flow.

Wes Anderson is known for his obsessive attention to detail, and here too, every frame looks like a postcard — meticulously planned, yet organically alive. The train compartments, the brothers’ matching luggage, the color-coded bandages — every element adds to the film's emotional storytelling.

Final Thoughts: Why You Should Watch It

If you’ve ever felt distant from the people you love…
If you’ve ever taken a trip hoping to find answers and ended up with more questions…
If you enjoy films that unfold slowly but leave a deep emotional echo…

The Darjeeling Limited is worth your time.

It’s not a film for those seeking fast-paced thrills or dramatic cliffhangers. It’s a quiet, strange, beautiful meditation on life, death, family, and everything messy in between. And like any great journey, it leaves you a little changed — without you even realizing it.

Verdict:

8.5/10 — Bittersweet, beautiful, and delightfully offbeat. A perfect blend of aesthetics and emotion.

Friday, 8 May 2020

ठीक हो? पूछने पर ना रूकती हुई खाँसी के बीच बमुश्किल कहते हो "ठीक हूँ, और एक चुप्पी पसर जाती है, कोई और सवाल नहीं सूझता पूछने को. किसको भेजूं तुम्हारे घर कि देख आये ताला लगा हुआ है या दरवाज़ा खुला है हमेशा की तरह. 

कुछ उम्मीदें साँस धीमे धीमे लेने लगती हैं. 


जब मरे चूहे की पूँछ पकड़ एक हाथ से  हवा में लहराया था तुमने और दूसरे हाथ से उसकी फोटो खींच रहे थे तब मेरा सफ़ेद पड़ा चेहरा देख ज़ोर से हँसे थे तुम, बहुत समय से तुम वैसे नहीं हँसे , अब तुम वैसे क्यूँ नहीं हँसते?

बेवज़ह की हँसी दुनिया की सबसे खूबसूरत शय होती है. 


दाढ़ी  भी तो बढ़ गई होगी न तुम्हारी, आओ पहले की तरह शेव कर दूँ, हमेशा की तरह  हँस कर तुम हर बार की तरह कहना देखा है कोई  नाई ऐसा जो गोदी में बैठ कर शेव करता हो, लेकिन भूल मत जाना  उस  बार तुम्हारी हँसी पे रेज़र ज़रा ज़ोर से चल कर ठुड्डी के पास एक कट लगा गया था. अरे! ध्यान से, दर्द होता है, दर्द ही तो दे रही हूँ. तुम चुप हो गए थे जाने मेरे शब्दों से या मेरी आवाज़ की ठंडक से. 

कभी सेवईंयों सी थी चुप्पियाँ अब बेपहर की दुपहर सी हों गईं हैं बीतती ही नहीं. 

एक दफा रोमैंटिक मूवी देखते समय एक दोस्त ज़ार ज़ार रोई थी, उसकी रुलाई ने तब हैरानी में डाला था, देर से समझ आया की क्यूँ रोई थी. चलो हम दोनों के बीच एक बात तो कॉमन है कि हम दोनों ही रोमैंटिक मूवी नहीं देखते. 

कुछ बातें  मन को हक्बक्का कर छोड़ के चल देती हैं. 

जिस दिन कहा की एस एम एस करना अच्छा नहीं लगता उस दिन से तुम्हारे मैसेज ना के बराबर आते हैं, एक तरफ़ा बातचीत तो कभी मुद्दा नहीं रही.

उधड़े हुए रंग खिड़कियों पर अच्छे नहीं लगते उन्हें बदल दो. 

सड़क किनारे रुक कर उसे देखती हूँ , नरम नरम गुलाबी से बुढ़िया के बाल कौशल से एक डंडी पे लपेटते हुए, मुंह में स्वाद घुल  जाता है, तुम्हे मीठा कतई पसंद नहीं ना, हलवाई से काले जाम खरीदती हूँ. 

पसंद नापसंद के भी अपने अलग से रिश्ते बन जाते हैं. 

हॉस्पिटल में  नर्स ने तुम्हे देख कहा था कितना यंग है और मेरी तरफ देख के कहा था बच जायेगा, हिंदी ख़राब थी उसकी. आई सी यू  के बाहर दीवार से टिक के खड़ी थी, तुम्हारे दोस्त ने कहा था भाई बेहोशी में आपको पुकार रहे हैं और कहा था धीमे से चिंता ना करें ठीक हो जायेंगे, सिर्फ सर हिला पाई थी. 
एक छोटा सा लम्हा छीना था कि बस  चूम सकूँ तुम्हारे होंठ. 
आज भी उस हॉस्पिटल के चक्कर लगा आती हूँ कभी कभी, तमाम चेहरे दिखते हैं लेकिन किसी में भी तुम्हारा चेहरा नहीं तलाशती. 

कुछ चेहरे कहीं तलाशे नहीं जा सकते वो सिर्फ होते हैं. 

तुम्हारी उस बड़ी सी खिड़की के पास वाली रिवॉल्विंग चेयर  पे सफ़ेद और पीले कुशन को देख मुंह से निकला था पीला तो तुम्हारा फेवरेट कलर नहीं है, अलमारी में किसी  किताब को तलाशते मुड़े बिना तुमने कहा था "तुम्हारा है", सच बताऊँ उस दिन बेइन्तेहाँ प्यार आया था तुम पे. 
तुम वैसे ही प्यार के इंतज़ार में होंगे ना?

कुछ इंतज़ार उम्र भर के हो जाते हैं, है ना !

जोधपुर चली जाओ 
ना 
क्यूँ? मैं वहां तुम्हारे सारे इंतज़ाम कर सकता हूँ, जाना पहचाना शहर है. 
तभी तो 
मतलब?
तुम थे वहां तुम हो वहाँ 
तो मैं चला जाता हूँ 
पिछले कुछ समय से सर झुका कर बैठने की आदत हो गई थी मेरी, ये बात कहाँ जानते थे तुम. मैंने भी तो कहाँ बचा कर रखा था कोई जरिया ये जान ने का कि अब किस शहर में हो तुम। 

कुछ नाते धीमे से करवट ले लेते हैं. 






Friday, 13 December 2019

खुद से बातें करते रहना .....

देहरी पे बैठे हुए दिखते हैं हम हमेशा मुझको, पीछे मुड़ के देखने पे कभी घर नही दिखता, याद नही कैसा था घर और अब फर्क भी क्या पड़ता है, तुम दिखते हो न बस इतना ही काफी है। देहरी पे बैठे हुए, पैंट मोड़ कर ऊपर पिंडलियों तक चढ़ाई हुई, बगल में बैठी मैं सोचती लड़कों के पैर भी क्या इतने साफ शफ्फाक हुआ करते है? मन करता छू लूँ लेकिन कभी हाथ बढ़ा ही नही , क्यों नही बढा ये कभी सोचा नही। तुम धीमे धीमे बोलते रहते मैं सुनती जवाब भी देती और आँखों से तुम्हारे पैरों को तुम्हे छूती रहती। तुमने भी कभी मेरी उँगलियाँ नही थामी , हमेशा चूड़ियों में उँगलियाँ उलझाये रहते। 
टूट जाएगी
अच्छा! कह कर मुस्कुराते लेकिन उँगलियाँ वहीं रहती।
टुकड़े सहेज लूँगा
लेकिन वो उँगलियाँ कभी ऐसे उलझी ही नही की तुम टुकड़े सहेजो।
ये अधूरी सी बातें भी तो कभी अधूरी नही लगी। जो था पूरा था।
छत पर खड़े हो एक जलती सी खाली  दोपहर कहा था जिस शहर में हो वहां की किसी सड़क किसी इमारत की एक फोटो तो भेजो।
जवाब में बेमौसम की बारिश आई थी और दप्प से बुझी दोपहर में धुआं भर गया था।
ज़ोर की खाँसी आई थी और इतना भर कहा था ऐसे भी किसी को कोई याद करता है भला।
उलहाना सुन तुम्हारी मुस्कुराहट बोली थी सब तो समझती हो तुम 
तुम्हारी दस्तक कानो में पड़ी जब तुमने कहा कि मेरे खत शर्ट की जेब मे रख के चलते हो, सारी चिट्ठियों को सहेजने वाला डब्बा तो मखमली लाल है तुम्हारी शर्ट किस रंग की होगी जब वो सारे खत तुम जेब मे रखोगे। कौन सा रंग सबसे ज्यादा जँचता होगा तुम पर।
बातें ना अधूरी हैं ना पूरी, बस हैं और इनका एक सिरा तुमसे लिपटा रहता है

खुद से कहना जाती हूँ मैं 
खुद से कहना आई मैं
 ऐसा भी होता है न हल्की सी तन्हाई में
 तन्हाई में तसवीरों के चेहरे भरते रहना 

खुद से बातें करना और तुमसे बातें करना एक ही तो बात है, है ना!

Wednesday, 10 October 2018








गोदी  में रखे हुए उसके हाथ देख रहा था,

मैं तुम्हे कुहनियों से पकड़ना चाहता हूँ कलाई से नही


क्यूँ,

उसने बालों को कान के पीछे करते हुए बिना नज़रें मिलाये पूछा


थोड़ी ज्यादा करीब रहोगी और हाथ छुड़ा भी नही पाओगी, उसकी तरफ झुकते हुए उसने कहा


आँखों से झाँकती शैतानी ने उसकी दबी दबी सी मुस्कुराहट को थाम लिया

उसका मन किया उठ कर उसके गले लग जाये कस के बहुत बहुत कस के

अपनी ख्वाहिश पूरी करने को वो उठ ही रही थी कि फोन की रिंग बज उठी


आँखें बंद किये वो मुस्कुरा रही थी बेतरह, फोन की रिंग सुन उसने मुस्कुराते हुए फोन की तरफ देखा, वो जानती थी कौन उसे इस वक़्त टहोक रहा है, घड़ी की तरफ देखने की जरूरत भी नही थी, उसने मुस्कुराते हुए फोन उठा लिया

क्या कर रही हो

हर सुबह ये आवाज़ उसकी साँस थाम लेती, उसे उस  एक दिन को बिताने की वजह मिल जाती, उसकी आवाज़ में खनक लौट लौट आती

तुम्हारे साथ के ख्वाब बुन रही थी,

होठों पे अपने हिस्से की मुस्कुराहट और आँखों मे उसके हिस्से की बदमाशियाँ रख उसने कहा-

चुड़ैल

और वो खिलखिला के हँस उठी

वो दिल थामे  आँखें बंद किये उसकी हँसी सुनता रहता

Saturday, 17 February 2018

" बुरी आदतों की वजह भी इतनी आशिकाना हो सकती है"

किसी प्रेम कहानी को लोगों के दिल में उतारने के लिए उस से जुड़ना , उसे जीना पड़ता है, और अगर उस प्रेम कहानी के  किरदारों से लोगों की वाक़फ़ियत है तो ज़िम्मेदारी और ज्यादा बढ़ जाती है।  सैफ हैदर हसन ने  कोशिश की अमृता साहिर की प्रेम कहानी को छूने की,  दिल्ली के प्यारे लाल भवन में "एक - मुलाक़ात" के ज़रिये।

  एक मुलाक़ात  , इस प्ले में सब कुछ ठीक था ,बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं था जिसकी वजह से डायलाग आराम से सुने जा सकते थे, मंच पर पीछे एक स्क्रीन पर इस प्ले से जुड़े तमाम लोगों के नाम दिखे, और अमृता साहिर के रूप में दीप्ति नवल और शेखर सुमन की फोटोज़। ये एक बेहद अच्छा प्रयोग था।  एक सीन में जब दीप्ति और सुमन की पीठ दर्शकों की तरफ है तो स्क्रीन पर उनके चेहरे दिखते  हैं, ये प्रयोग लाजवाब लगा।
                            प्ले शुरू होने से  पहले शेखर सुमन ने एक नज़्म पढ़ी, जिसमे उर्दू लफ़्ज़ों के सही उच्चारण पर इतना ज्यादा ज़ोर दिया गया था की लगा ही नहीं की नज़्म सुन रहे  हैं,शायद यही वजह है की नज़्म कौन सी थी ये याद नहीं लेकिन शेखर सुमन का "ख़" पर ज़ोर देना याद है। हो सकता है कि शेखर  साहिर की तरह दिखते  हों  लेकिन उन्होंने स्टेज पर ज़रा सी भी कोशिश नहीं की साहिर को जीने की , ना ही अमृता के बगल में बैठे हुए, ना उनसे बातें करते हुए , शेखर से साहिर  की नज़्में सुनते हुए नज़्म पर कम और उर्दू शब्दों की ओर ध्यान ज्यादा गया।  उर्दू शब्दों के उच्चारण पर शेखर सुमन ने  इतना ज्यादा ज़ोर दिया की नज़्म कहीं खो सी गई और ये बात खल  गई।  डयरेक्टर ने उन नज़्मों को चुना जो पहले ही फ़िल्मी गीतों के रूप में मशहूर हैं , शायद दर्शकों को साहिर के कलाम से जोड़ना वजह रही हो।  आखिर में शेखर सुमन ने बताया की ये उनकी 74 वी मौत थी यानी की इस प्ले का ये 74 वाँ शो था, कमाल है और अब तक  किसी ने शेखर सुमन को ये नहीं बताया की उन्हें वीर रस में साहिर की नज़्में नहीं पढ़नी चाहिए। 


  ये काल्पनिक मुलाक़ात होती हैं छत पर जहाँ अमृता अकेली बैठी हैं और अचानक साहिर आ जाते हैं, जहाँ दोनों  अपने बीते दिनों के बारे में , एक दूसरे के ख्याल , अहसास के बारे में बातें करते हैं।  दीप्ति अमृता प्रीतम की कुछ पँजाबी कविताएं पढ़ती हैं।  अमृता का छत पर बैठना दरवाज़ा अंदर से बंद कर के और नीचे से इमरोज़ का अमरता -अमरता पुकारना बेहद खूबसूरत था।  वो कलाकार सिर्फ अपनी आवाज़ से अमृता के प्रति इमरोज़ के लगाव को दिखा गया जो शेखर सुमन एक घँटे की अपनी परफॉर्मेंस में नहीं दिखा पाए। 


दीप्ति अमृता के रूप में पूरी तरह घुली नहीं, लगा जैसे की वो अमृता प्रीतम के सामने ठिठकी सी खड़ी हों आगे बढ़ के उन्हें गले नहीं लगा पा रही हों। रसीदी टिकट के कुछ वाकयों को दीप्ति ने सुनाया, हाँ सुनाया ही सही है क्यूंकि लगा ही नहीं की अमृता वो सब याद कर रही हैं। 

क्या ये ज़रूरी है की उदास नज़्में बेहद उदास , रोती  हुई आवाज़ में सुनाई जाएँ? क्यूँ  खाली आवाज़ में उदास नज़्में नहीं सुनाई जा सकती? 


 दीप्ति ने बिना म्यूजिक के कुछ लाइन्स गाई जो की बेहद खूबसूरत थी, उनकी आवाज़ दिल में उतर गई, बाद में लगा काश इसे रिकॉर्ड किया होता।                                                                                                      
  थोड़ा सा फ़िल्मी टच भी था, बम्बई से ट्रंक कॉल है सुनते ही लगा की साहिर की मौत की खबर है जिसे अमृता तीसरी बार की ट्रंक कॉल में सुन पाई। 


                                                                                                                                              
खैर ये प्ले दीप्ति नवल और  शेखर सुमन की कहानी नहीं था, ये उस प्रेम कहानी पर  था जो एक रसीदी टिकट के छोटे से हिस्से पर लिख दी गई और जो आज शाम 7 :40 पर  शुरू हुई और 9  कब बज गए पता भी नहीं चला। 





"तुमने इमरोज़ को मेरी यहाँ मौजूदगी के बारे में क्यों नही बताया"

स्कूटर पर इमरोज़ के पीछे बैठ कर जब मैं उनकी पीठ पर उँगलियों से तुम्हारा नाम लिख सकती हूँ तो मेरी खामोशी में इमरोज़ तुम्हारी मौजूदगी सुन ही सकते हैं।

Sunday, 18 September 2016

कभी मेघालय में मुझे कुछ दो-एक साल रहने का मौका मिला था , वहां की तारीफ करने को  बहुत कुछ था जैसे की जीरो पॉल्यूशन  एरिया , हर घर में जलते अलाव, वहां का मौसम , सब कुछ तो बेहद खूबसूरत था लेकिन एक बात खटकती थी की वहां के लोग "हम लोगों" से सीधे मुंह बात नहीं करते थे , किसी शॉप पे जाओ तो हमें सबसे बाद में अटेन्ड किया जाता था , गुस्सा आता था की ऐसा व्यवहार क्यों?  जवाब शायद पता था लेकिन उस जवाब से आँख मिलाये कौन, लेकिन  परदे पर जब  वकील एक लड़की से कहता है कि  "अच्छा तो तुम नार्थ ईस्ट से हो, कहाँ से?, मणिपुर से?, बाद में जब दूसरा वकील कहता है कि  किसी के चरित्र का निर्धारण क्या इस बात से किया जा सकता  है कि  वह देश के किस हिस्से को बिलोंग करता है?  हम स्तब्ध नहीं हुए , गुस्सा नहीं आया बल्कि सर शर्म से झुक गया , याद आया कि   किसी को सिर्फ इसलिए पीटा गया था  कि  वो नार्थ ईस्ट से है या फिर, कॉलेज कैंपस में किसी पर फब्तियां कसना क्योंकि वो नार्थ ईस्ट से है  या फिर  "चिंकी" शब्द का प्रयोग।
                 



                 पिंक फिल्म है पूरी तरह से इसके  स्टोरी राइटर,स्क्रीन प्ले/ डायलॉग राइटर, एडिटर और डाइरेक्टर की, जो बिना शोर किये आपके बेहद पास आ कर  बम ब्लास्ट के बाद का सन्नाटा पैदा करती है। ये फिल्म ऐसी बहुत सारी बातों को आवाज़ देती है जिसे हम नार्मल मान कर बैठ गए हैं,  पार्क में टहलती हुई मीनल अरोरा को देख कर लड़कों का रिमार्क-"देख, देख वही है सूरजकुंड काण्ड वाली", ये सीन देख कर कुछ भी एबनॉर्मल  नहीं लगता ,मीनल अपने सर को कवर करती है, वो छुपना चाहती है , ऐसा ही तो होता है न, समाज यही तो उम्मीद करता है न लड़कियों से,  लेकिन अमिताभ उसका सर खोल देते हैं , अमिताभ का मीनल के सर को खोलना हिम्मत और उम्मीद देता है की हमारे आस-पास ऐसे लोग भी हैं वहीँ राजबीर भी है जो पढ़ा-लिखा है, लन्दन से पढ़ कर आया है  लेकिन फिर भी मानसिकता वही की वही है कि  "अच्छी लडकियां ड्रिंक नहीं करती, लड़कों से हंस के बात नहीं करती, पार्टीज में नहीं   जाती", क्या फायदा ऐसी पढाई-लिखाई का ? कहाँ चूक हो गई हमसे कि आज के  पढ़े-लिखे , दुनिया देखे युवा की भी  सोच वही सदियों पुरानी है।  
                                                                     कोर्ट रूम में अमिताभ का ये कहना मीनल से -" I can't hear you" , मीनल का रुक-रुक कर , डर कर, धीमी आवाज़ में जवाब देना,  फिल्म के ये सीन देख कर लगा क्या वाकई हमने यही सिखाया है अपनी  लड़कियों को की सही हो फिर भी  डरना , धीमी आवाज़ में बोलना !!  आज भी जब फिल्म देखने जाते हैं तो परिवार की महिलाएं बीच में बैठेंगी ऐसा बच्चे भी सीख जाते हैं क्योंकि बगल के सीट पर बैठे पुरुष पर भरोसा करना सीखा  ही नहीं , क्योंकि अगर आप कुर्सी पे आराम से हाथ रख कर बैठेंगी तो बगल के पुरुष को आप "हिंट" देंगी की वो अँधेरे में आप को छू सकता है जैसा की इस फिल्म में राजबीर को समझ आया।

                                 



     पिंक फिल्म है तीन लड़कियों की जो रॉक कॉन्सर्ट में जाती हैं, हंसती बोलती हैं, फ्रेंड के फ्रेंड से मिलती हैं, साथ बैठती हैं ड्रिंक करती हैं "वैसी" लड़कियाँ होंगी तभी तो।  फिल्म में एक कहानी है ( सुकून, आश्चर्य कि कहानी है) जो इधर-उधर कहीं भी नहीं भटकती, एक भी सीन फ़ालतू, ठूंसा हुआ नहीं लगता और यहीं इस फिल्म की टीम बाजी मार ले जाती है ,अपनी बात को सलीके से कहिये तो दुनिया सुनेगी ये प्रूव कर दिया  अनिरुद्ध रॉय चौधरी और रितेश शाह ने।  
                                                  फिल्म में अमिताभ लड़कियों के लिए सेफ्टी रूल बनाते हैं, लड़कियों को "ऐसा-ऐसा"नहीं करना चाहिए,सुन कर क्या किसी को आश्चर्य हुआ? नहीं न, बचपन से यही तो सुनते आये हैं, और अपने बच्चो को भी तो यही सिखाया है , आपके अंतरवस्त्रों पे नज़र रखने वाले आप का चरित्र निर्धारित करते हैं, कुछ अजीब नहीं लगा, अजीब लगा तो ये की किसी ने तो इन बातों पे सवाल उठाया, किसी ने तो हमारी मानसिकता में बैठी हुई इन बातों को बाहर ला कर खड़ा किया, जवाब माँगा और खुल कर माँगा। 
                                                                   
                                   

  कॉकटेल फिल्म में जब वेरोनिका, गौतम की माँ के सामने,  पैर फैला कर बैठती है तो रणधीर उसे इशारे से बताते हैं की लड़कियों को कैसे बैठना चाहिए तो लगता है सफर अभी बहुत लंबा है.
                                                                                                             अमिताभ का कोर्ट में मीनल से  कहना की "आर  यू अ  वर्जिन" और जज का कहना की मीनल चाहे तो इस बात जवाब नहीं भी दे सकती है या वो ऑन  कैमरा जवाब दे सकती है ,तो लगा  वाकई सफर बेहद लंबा है लेकिन चोट पड़नी  शुरू तो  हुई। 
          मीनल को गिरफ्तार करने आई पुलिस को देख   कर सोसाइटी के लोग सिर्फ देखते हैं जैसे की वो उन लड़कियों को देर रात आते देखते हैं या उनके कपड़ो को देखते हैं या फिर उनके घर आये उनके दोस्तों को. 
                                                            पुलिस अधिकारी का ये कहना की "आप ने भी तो पी रखी थी मैडम"उसका लहज़ा और चेहरे के भाव कुछ सोचने के लिए नहीं छोड़ते की पीने वाली लड़कियों को किस निगाह से देखता है हमारा पढ़ा-लिखा समाज।  अमिताभ पुलिस कण्ट्रोल रूम फोन करते हैं कि  उनकी आँखों के सामने एक लड़की को उठा लिया गया तो महिला पुलिस का इरिटेटिंग स्वर है की गाडी का नंबर तो नहीं है न आपके पास।  पुलिस अधिकारी का कहना है की ऐसी कोई शिकायत नहीं मिली उन्हें, ये देख कर लगता है की अगर १०० नंबर उठ भी जाए तो क्या कोई कुछ करेगा? 
                                                       फिल्म इस बात को ज़ोर दे कर कहती है की "ना" को ना ही समझिए  फिर वो किसी लड़की की ,  किसी दोस्त  की ना हो, गर्लफ्रेंड की ना हो , सैक्स वर्कर की ना हो या फिर आपकी बीवी की ना हो, ना मतलब ना, भूल जाइये वो सदियों पुरानी  उक्ति की" लड़की की ना में ही उसकी हाँ होती है"  
             ये फिल्म जो कहना चाहती है शानदार तरीके से पूरे कन्विक्शन के साथ कहती है।  फिल्म में गानों की कमी बिलकुल भी नहीं खलती , कारी कारी गाना परदे पर चल रहे दृश्यों को अंतस में गहरे तक उतार देता है।  
                                         
                बस एक बात समझ नहीं आई की फिल्म का ताना बाना जिन दृश्यों पर बुना  गया जब वो दृश्य पूरी फिल्म में दिखने की ज़रूरत अनिरुद्ध रॉय चौधरी महसूस नहीं हुई जो की एक ब्रिलिएंट आईडिया था तो उन दृश्यों को आखिर में क्यों दिखाया गया, क्या निर्देशक को ये यकीन नहीं था की दर्शक न्याय व्यवस्था पर यकीन नहीं कर पाएंगे या फिर  जब फैसला लड़कियों के पक्ष में हुआ तो निर्देशक को लगा की उस फैसले के सपोर्ट में वो दृश्य दिखाए जाने चाहिए कि लडकियां झूठ नहीं बोल रही थी। 
                                         

फिल्म क्यों नहीं देखी  जानी चाहिए ---- अगर आपको इसके नाम  से ऐतराज़ है , ये रंग  लड़कियों का कहा जाता है ना।  
--- अगर आप  आँख मूँद कर रहने में ही भलाई समझते हैं।
----अगर आपने अपने बेटों को सिखाया है की लड़के रोते  नहीं हैं।  
----अगर आपको लगता है की लड़के हैं उनसे गलतियां हो ही जाती हैं। 



फिल्म क्यों देखी जानी चाहिए -------  अच्छी कहानी, कसा  हुआ निर्देशन 
                                      -------- अमिताभ की बोलती आँखें 
                                    -------- सभी की अच्छी एक्टिंग 
                            --- अगर आपने अपने बेटों को सिखाया है की लड़के रुलाते नहीं हैं।  
                                 

                                                    

Tuesday, 6 September 2016

हथेली के सारे रंग,
 मल देना मेरे चेहरे पर,
  दिखाई में आती  रहे तो बस
   उगी हुई आँखें,

उठा लेना कांधों से ऊँचा मुझे,
                 की
चटका सकूँ दागिल  एक ख्वाहिश
और
अटका दूँ तुम्हारे माथे.

सुनो न,
      करना कुछ ऐसा
कि,
   संस्कार के  अंतिम क्षणों में,
 बंद लगाना
काले धागे से
पैरों के दोनों अँगूठों में ,
धागे के सिरों को
पकड़
ज़ोर से कसना,
बचा न रह सके
कोई भी रास्ता
कहीं उभरने का ,
चन्दन, फूल , कपूर,
हिय-आस
सब दहका एक साथ  देना
और

पुकार उठना श्वास की लय  पर,
प्रेम नाम सत्य है
प्रेम, प्रेम

सुन रहे हो ना,

ऐ ! औघड़ !!!!

Wednesday, 31 August 2016


                                                       उसकी मर्ज़ियाँ 







क्या कर रही हो?
जीने का सामान संजो रही हूँ.
दर्द पाओगी !


मुस्कुरा के मैंने रिकॉर्डर बंद कर दिया, क्या जरुरी है की उसकी जानकारी में ही रिकॉर्ड की जाए उसकी आवाज़।


    एक चेहरे को नींद में डूबा  हुआ देखना सुकून भर होता है , कितनी शान्ति , धीमे से हथेलियों को उँगलियों में उलझाती हूँ तो वो चेहरा मुस्कराहट की डुबकियां लेने लगता है, स्पर्श की भी अपनी भाषा होती है ये तुमने ही मुझे समझाया।  तुम्हारी आँख खुले उसके पहले रो लेना चाहती हूँ, तुम नींद में बोल उठते हो
पास रहोगी न ? हमेशा ?

हमेशा ! इस से अलग कुछ कह सकती हूँ भला!!!


हम कभी इस कमरे से निकल हरी घास पर बैठेंगे या नहीं , नहीं जानती , रोज़मर्रा की किसी मामूली सी बात पर कभी झगड़ेंगे या नहीं , नहीं जानती, तुम्हे क्या कुछ नुक्सान देता है इस लिस्ट को कभी अनचेक कर पाउंगी या नहीं, नहीं जानती, अब तो कुछ भी जानना नहीं चाहती.

  तुम्हारी साँसों को सुनना राहत भरा होता है, आज शायद तेज़ हैं साँसें, कल तो इतनी तकलीफ नहीं थी ?,
 तुम हँस देते हो ,
आज भी नहीं है, तुम हो न सब दिन।
नींद आ रही है ?
नहीं, तुम आ रही हो.
जैसा तुम्हारा मन होगा वैसी ही साँसें होंगी मेरी , सीने पे हाथ रख तुम किसी फ़िल्मी नायक की तरह मुस्कुरा देते हो और मैं  तुनक उठती हूँ.

अच्छा सुनो
हम्म
आई लव यू
हम्म
सुनती भी नहीं हो
सुन तो लिया


तुम लिखा करो न
लिखती तो हूँ
यूँ नहीं, कविता लिखा करो
लिखी ना "तुम"
जब चला जाऊँगा तब तो लिखोगी न
तुम एकटक देखते हो मेरी तरफ, मैं निगाह नहीं मिलाती , जानती हूँ उदास आँखों में और ज्यादा उदासी संभाली नहीं जाएगी.

बहुत दुःख पाओगी
हम्म, अभी भी सुखी हूँ और हमेशा रहूंगी
क्या सुख है , ज़रा कहो तो
तुम नहीं समझोगे


तुम नहीं समझोगे कह कर कितना कुछ तो कहा जा सकता है और कितना कुछ सुना जा सकता है.







परदे बंद कर दो
क्यों, अच्छी धूप है
नहीं चाहिए, आँखों में चुभती है, वैसे भी एक दिन तो इस खाली कमरे में रौशनी को ही रहना है



साँसों को सुनते , घर घर खेलते रात चलती है सुबह की तरफ।


इस कमरे में मुझे खूब सारे रंग चाहिए
क्यूँ
देखो न हर तरफ सफ़ेद-सफ़ेद  तुम बोर नहीं होते?
तुम मुझसे बोर हो सकती हो कभी

(ये प्रश्न नहीं था , उदासी में डूबी हुई जिज्ञासा भर थी, समझने लगी हूँ, प्रेम भी आश्वासन मांगता है)

हद्द है, कहाँ की बात कहाँ ले जाते हो,
तुम पहना करो न सफ़ेद रंग तुम पर अच्छा  ....

बोलते बोलते तुमने मेरा फीका पड़ा चेहरा देख लिया और तुम्हारे शब्द हम दोनों के बीच टंगे रह गए.



सुनो ! कुछ सुनाती हूँ.
ह्म्म्म

"कितनी तेज़ हवा चल रही थी उस समय,
अगर तुम्हारा एक आंसू
इस कागज़  होता
तो यह कब का उड़ चुका होता."

किसने लिखी  है।
गीत चतुर्वेदी , कितना अच्छा लिखा है न.
हाँ, मगर मेरी आँखों से दिल  के बीच एक बड़ा सा खला है, वहीँ सब रह जाता है उसे तुम्हारे अलफ़ाज़ ही पार कर पाते हैं.



हम घूम चुके बस्ती-बन में
इक आस का फाँस लिए
मन मेंकोई साजन हो, कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो, कोई तारा हो
जब जीवन-रात अंधेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो।





इब्ने इंशा न?
ह्म्म्म
आगे सुनोगी?
इनको सुन ने के लिए तो जलते अलाव और तुम्हारे पहलू वाली रात चाहिए।
दो में से एक तो है ही
तुम्हारी मुस्कराहट पर मैं बलिहारी।





ढेर सारी सीडीज़ इकट्ठी हो गई हैं, बिना किसी दिन बिना किसी तारिख के बोझ को उठाये हुए, तुम्हारी आवाज़ के साथ ठहर कर खड़े उस लम्हे को दुबारा जी लेती हूँ, फर्क क्या पड़ता है की वो अक्टूबर के कुनमुनाते दिन थे या ठन्डे पानी से तुम्हारे स्पर्श को जोहती जून की उबली उबली सी रातें।

मिचमिची आँखों से बारिश की आवाज़ सुनती हूँ , सीवन जगह-जगह से उधड़ने सी लगी है , संभाल रखा है फिर भी दरारों में से बहुत कुछ फिसल ही जाता है, वैक्यूम में कोई मौसम पग फेरा नहीं करता, बिसरी राहें, पहचान लिए, अँगूठे में बंध जाती हैं,




सब से ज़्यादा वज़नदार, *खाली जेब होती है...* साहब चलना मुश्किल हो जाता है..... 


              












Friday, 26 August 2016


                                   मनमर्ज़ियाँ 







बिस्तर के एक कोने पे बैठ कर  शीशी खोली, एक हाथ की उँगलियों को शीशी का सहारा बना दूसरे हाथ की हथेली को सिकोड़  उसमे गड्ढा सा बनाया,  शीशी से गोलियों का टप्प से गिरना देख रही थी , जैसे  आखिरी सीढ़ी से कभी कूदा  करती थी, पता नहीं कहाँ दुबक गए वो सीढियां कूदने वाले दिन, सोचते-सोचते  अचानक फिक्क से हंस दी, ऐसी हंसी जो खुद अपने  कानो तक बमुश्किल पहुंची और फिर  ऐसी ही अपनी एक फिक्क वाली हंसी याद आ गई. उन दिनों  सैर को जाया करती थी, सुबह या शाम अब  याद नहीं  , सूरज के उगते वक़्त या ढलते वक़्त  घर से निकलती थी राम जाने वैसे फर्क भी क्या पड़ता है इतने सालो बाद ,  वो फिक्क वाली हंसी याद है यही क्या कम है, कैसे कुछ बातें,  कुछ इंसान  दिमाग से नहीं निकलते सालों की गर्द  से कैसे गर्दन बाहर  निकाल हाथ हिलाते हुए अपनी याद दिला जाते हैं हालांकि कई बार हिलते हुए हाथ और चेहरे की झलक के इलावा कुछ याद नहीं आता , एक आदमी था जो  हर रोज़ सैर पे मिला करता था, कभी वो आगे निकल जाता कभी पीछे रह जाता, वैसे अगर   पूरी ईमानदारी से याद किया जाए  तो वो आदमी अक्सर आगे ही निकल जाता था , दोनों एक ही मोहल्ले के वासी हैं  इसका  शत  प्रतिशत यकीन था , वो ऐसे की सैर वाली जगह के आस पास एक ही ढंग का मोहल्ला था ,  रोज़ की मुलाक़ात कभी कभी की मुस्कराहट में तब्दील हो गई थी, लेकिन बात-चीत तो क्या नमस्ते तक भी नहीं पहुंची थी, हाँ तो एक दिन सैर के बाद  पास की दूकान में गई , क्या लेना था अब याद नहीं लेकिन कुछ तो लेना ही होगा तभी गई थी ,  दिमाग पे ज़ोर डालना हमेशा से ही  गैर जरुरी लगा , पीछे पीछे वो आदमी भी पहुँचा  , उसे भी कुछ सामान लेना ही रहा होगा, उस आदमी को देखते ही  फिक्क से हंस दी, हंसी भी ऐसी की अपने  कानो तक क्या वो तो और लोगों के कानों को भी गुलज़ार कर गई , वो न हँसा  न मुस्कुराया,   उस दिन भी  खुद से बातें कर रही थी जैसा की अक्सर किया करती थी , इसकी वजह शायद किसी का न होना था या कुछ और अच्छा किया जो भगवान् ने याद नहीं रहने दिया, खुद से बातें करने में   ये  कष्ट है की बात में से बात निकलती जाती है और असल बात किसी बरामदे  रुकी रह जाती है, वापस लौट उसका हाथ थाम लाना पड़ता है. उस दिन के बाद सैर पर जब भी  मिला मुंह ही फेर उसने हर बार, आज क्यों याद आई ये बात , शीशी, गोलियां और उस आदमी का कोई लेना-देना है क्या, लगता तो नहीं, खैर. .....


                                     दो और दो का जोड़ हमेशा, चार कहाँ होता है ,                                                                                      सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला

पूरा एक साल हो गया या थोड़ा ज्यादा , इसी बात को रुक रुक कर धीमे धीमे कह के देखती हूँ, बोल भी सकती थी लेकिन कहना मुझे थोड़ा काम मुश्किल लगा, एक एक शब्द को कंठ में घूमते हुए महसूस करना फिर ज़बान और दाँतों के बीच से निकल खुद अपने ही कानों में पड़ना, मुझे क्या ज्यादा हिट करता है , ये ख्याल या ये आवाज़ ? कुछ भी नहीं, ये एक ख्याल है जो और हज़ारों ख्यालों की तरह उड़ जाएगा, आवाज़ कुछ पल दिमाग में खलल पैदा करेगी फिर वो भी चुप मार बैठ जायेगी और सब कुछ अनवरत चलता रहेगा जैसे चलता रहा है,
                       आसमानो पे मन मर्ज़ियाँ उकेरनी आसान होती है , ये आसानी तब बेढब लगती है जब आसमान टूटता नहीं , चुप से पिघलता भी नहीं,

अब कुछ नहीं सूझता न किस्सा न कहानी , माथे अब कोई मौसम नहीं उतरता , बर्फ़ नहीं जमती ना ही गर्म पानी के फ़व्वारे छूटते हैं और ना ही शांत नदी सी बहती है, कहीं शून्य भी दस्तक नहीं देता , जब कोई मौसम नहीं तो कहीं कुछ नहीं, ब्रम्हांड की नीरवता भी नहीं.

उम्मीदें लौटती हैं, लेकिन कब का कोई जवाब नहीं और आँखें सिकोड़ माथे को हथेली की ओट दे देखना अभी सीखा नहीं और न कोई इरादा है ,

                 सुबह से बारिश हो रही है और आज बारिश की आवाज़ से आँख खुली , खिड़की के बाहर सब कुछ भीगा हुआ बस मन सूखा पड़ा था , कमरे के एक कोने पे खड़े हो सोच रही थी काम कहाँ से शुरू किया जाए , एक मन ने कहा आज क्या जरुरी है की कुछ किया जाए, झुक कर रौशनी में फर्श को देखा कुछ क़दमों के निशान थे उधेड़बुन चल रही थी की साफ़ करूँ या बारिश के मिजाज़ को देखती रहूँ फिर लगा ऐसे तो ज़िन्दगी ही ठहर जायेगी, कभी कभी ज़िंदा होने के अहसास के लिए रोज़मर्रा के काम करते रहना जरुरी हो जाता है.


किसी का होना सच नहीं,

और
किसी का न होना भी
सच नहीं,
होने ना होने के बीच
हो सकते हैं
वो अनगिनत तारे
जो
बचे रह जाते हैं
कालखंड की निगाह से'


न इस तरफ
न उस तरफ
ठीक लकीर पर खड़ी
संभावनाएं
सीख जाती हैं
हथेली पर रखना
बुद्ध को.



अभरक के हज़ार मौसमों में से,
किसी एक पर
अज्ञात फूंक मार दे
और
अगली साँस आने से पहले,
एक ख्याल आने से भी पहले ,
बाँध दे जुगनू के कांधों से.



एक कहानी जो कभी शुरू नहीं होती ,
गुज़रती है ,
उन रास्तों से
जो अंतहीन
मिलते जाते हैं एक दुसरे से,
और
कहीं नहीं पहुँचते।


माचिस की एक तीली जलाओ
और सुनो पंजों के बल खड़े हो कर,
आती हुई प्रतिध्वनि
भूलभुलैया से ,


बचा है क्या प्रेम ???


































Monday, 14 March 2016

उस रात उनींदे होंठों से
रखा था
एक तिल गले पर,
उसी रात सी रात में
आधा- अधूरा सा मुस्कुरा,
एक नज़्म ने
बर्फ सी आँखों पर
अपनी प्यास रख
पलकों से पलकों को उलझा लिया था,
उसी रात तो
एक प्यास अलाव से उठ कर
हलक में तैर गई थी,
उस रात की वो रात
अब भी
वहीँ रुकी सी है,
आते कदमो की आहट
के इंतज़ार में ।।।

Wednesday, 16 December 2015



सुनो, एकदम से जुदाई बहुत मुश्किल है
ऐसा करो, कुछ किश्तें तय कर लो।





खनकती हँसी और लरज़ते लम्हों को भूल,
अपनी लकीरों से मुझे कैसे ओझल करोगे, चलो तय कर लो।




मेरे चेहरे का सूनापन जितना तुमसे मिलता हो,
छाँट लो, फिर उसे भरने की तरकीब क्या हो
आओ, तय कर लो।




मेरे बिन तुम और मैं तुम बिन, अच्छे नही लगते।
आओ न, साथ रहने के सलीके तय कर लो।

Sunday, 17 May 2015

अन्दर का मौसन जब ठंडा लगता है, स्नो फ्लेक की तरह गिरती हुई ठण्ड नहीं बल्कि जमी हुईं ठण्ड , एक दुसरे कंधे आपस में छूते हैं फिर भी बीच में पसरी हुई ठण्ड पिघल नहीं पाती तो बाहर निकल के खड़ी हो जाती हूँ. चलती ट्रेन के दरवाज़े पे खडा होना , एक अजीब सी तसल्ली से भर देता है. अन्दर सब कुछ कितना सुकून भरा है, सुकून की कहीं कुछ भी नहीं बदलेगा, आज जो है कल भी बिलकुल इसी शक्लो-सूरत में दिखाई देगा , पूरी दुनिया जैसे एक बंद कमरे में सिमटी हुई, आरामदेह लेकिन बंद , लेकिन बाहर दरवाज़े पे खड़ा होना जीवन जीने जैसा लगता है, सर्द और गर्म के बीच में झूलने जैसा. ट्रेन की गति धीमी होती है अब वो धीरे धीरे सरक रही है, सामने से एक और ट्रेन गुज़रती है, मानो इससे मिलने के लिए ही गति कम की गई हो, सामने तुम दिखते हो, उसी तरह पायदान के ऊपरी हिस्से पे खड़े हुए, तुम उदासीन नज़रों से देखते हो मेरी तरफ , लगता है जैसे सिर्फ तुम्हारी आँखों ने देखा निगाहों ने नहीं, मैं एकटक देखती हूँ तुम्हे, तुम आँखें फेरते हो, हवा में तुम्हारे बाल कोई गीत गुनगुना उठते हैं, अचानक कोई भूली बिसरी याद तुम्हारे माथे उतरती है और तुम पलट कर पहचानी हुई निगाहों से मेरी तरफ देखते हो लेकिन तब तक दोनों ट्रेन्स एक दूसरे को लगभग पार कर चुकती है , मैं परेशान नहीं होती, यही तो ज़िन्दगी है, जब तक पहचाना हम अलग हो चुके होते है, क्या फर्क पड़ता है, फिर मिलेंगे किसी मोड़ पर किसी तिराहे पर, ये पटरियां यूँ ही बिछी रहेंगी और उन पर ये ट्रेन्स भी हमें लिए यूँ ही दौड़ती रहेंगी, फिर जब कभी हम एक दूसरे के सामने से गुजरेंगे तो आँख भर जी लेंगे एक दूसरे को, सब्र है मुझमे बहुत.

Saturday, 2 May 2015



सदियाँ गुज़र चुकीं
और
अभी न जाने कितनी सदियाँ गुज़ारनी हैं,
निहारते हुए
तुम्हारी मुस्कुराती आँखों  को,...
जो झांकती हैं दीवार पर टंगे एक फ्रेम में से,
तुम्हारी कुछ आदतो के साथ
मेरा झगड़ा अब भी वैसा ही है
फिर भी
अपनी हज़ार न- नुकुर के बाद भी
एक हाथ से ज़मीन पोंछ,
दुसरे हाथ से तुम्हारी चप्पलें
वहीँ रख देती हूँ, दरवाज़े के उसी एक कोने में
सच के साथ तालमेल बिठाना सीख लिया है अब
तुम्हारा नहीं होना स्वीकारा है मैंने
बाहों पर तैरती तुम्हारी गुनगुनाहट
और
उँगलियों में उलझी तुम्हारी आदतों के साथ
तुमने अपने वादे नहीं लौटाए
और
मैंने अपनी हथेलियाँ नहीं सिकोड़ी
कहीं कोई सन्नाटा नहीं
कहीं कोई आहट नहीं
कोई शिकायत भी नहीं
लेकिन
तुम ही कहो तो
ऐसे भी भला कोई जाता है बिना बताये!!!

Wednesday, 8 April 2015

अक्सर ही हम अपने आस-पास से खुद को जोड़ कर यादें पैदा कर लेते हैं और ये सब इतने सहज ढंग से होता है की यादों का इक्कट्ठा होना पता भी नहीं चलता. असहज तब लगता है जब किसी जगह, किसी सड़क से कोई याद न जुडी हो. एक शहर पीछे छूट गया कुछ ऐसे ही बिना किसी याद के. किसी जगह दो साल रहना और चलते समय उसकी याद से खाली होना मुझे अचंभित करता है. किसी शहर के एक घर में बिठाये हुए दो साल .... उन दो सालों में काफी कुछ हुआ ,काफी कुछ किया, क्या ये याद है? नहीं, मेरे पास एक भी ऐसी याद नहीं जिसे चुप बैठ कर सोचा जाएइस शहर ने मेरे हाथों में मेरी किताब दी तो लोगों पर भरोसा करने की आदत को छोड़ने की सलाह भी दी, . इस शहर में ज़िन्दगी ने एक नया रंग दिखाया.
                                                     अब  नया शहर नए कायदे क़ानून और इस शहर में अपने लिए थोड़ी सी जगह की जद्दोजहद। दोस्त आलोक ने कहा न्यू लाइफ न्यू चैलेंजेज एन्जॉय ईट। बहुत सुकून देने वाले शब्द थे। जब से ये न्यू लाइफ का चेहरा देखा है तब से हर किसी ने सिर्फ लेक्चर ही दिया है  या ये अहसास कराया है की कुछ भी करके मुझे वापस उसी ज़िन्दगी में लौट जाना चाहिए। सूरज का कोई उत्तराधिकारी नहीं हो सकता ये सच है तो वहीँ ये सच भी है की एक तारा अपनी रौशनी से उम्मीद  की एक किरण तो दिखा ही सकता है। अलोक के शब्दों ने वही काम किया है। बड़े से बंद गेट के एक तरफ खड़े हो कर जाते हुए बेटे को देखने के लिए हिम्मत चाहिए और मुझे नहीं लगता की दुनिया में कोई ऐसी माँ होगी जिसमे ये हिम्मत हो। और जब पता हो की अगले महीने दी गई एक तारीख पर आप सिर्फ  फोन पे बात कर सकते हैं और मुलाक़ात की फिलहाल कोई सूरत नहीं तो आँधियों को उदासीनता के साथ देखना और उनसे गुज़र जाना सहज लगने लगता है. 
                                                                       ज़िन्दगी जब उलटी दिशा की तरफ चल पड़े तो इस बदलाव को सहज रूप से लेने या कहना चाहिए की इन हालात में मुस्कुराने की हिम्मत बच्चों में शायद ज्यादा होती है। उसने मेरे काँधे पे हाथ रख कर कहा रो मत मैं जेल में नहीं हूँ और जो तारीख है उसपे फोन कर लेना, हिम्मत रखो मैं जल्दी ही आऊंगा।शान्ति से आये हुए तूफ़ान बहुत गहरे निशान छोड़ते हैं। नकाबों में पड़ती दरारें," हमने तो पहले ही कहा" था सरीखी मुस्कुराहटें अब हौसले का काम करती हैं।
                                                                  पता नहीं क्या खाया होगा, कैसे खाया होगा, उसकी पसंद का कुछ बना भी होगा या नहीं, रात में ठण्ड तो नहीं लगी होगी, ढेर सारे सवाल हैं और जवाब एक भी नहीं. जानती हूँ सेफ हाथों में है फिर भी सवाल अपनी जगह कायम हैं और मैं जवाब की अधिकारी नहीं. 
                                                                              ईश्वर और दोस्तों ने हाथ थामा हुआ है और उम्मीद पूरी होने की उम्मीद में जिए जा रही हूँ की एक दिन सब ठीक हो जायेगा , उस दिन के इंतज़ार में उम्र और अहसास सब रुके हैं.....
                        सांसें छोटी-छोटी सेवइयों की तरह होती हैं खट से टूटने वाली, घर के बाहर बैठी उस एक सीढ़ी से लेकर उस बंद दरवाज़े तक की एक साँस उधार चाहिए फिर सब ठीक हो जायेगा....
                                                                                 

Tuesday, 10 March 2015


                                    एक कारण दो....




लोगों के सामने हँसते- खिलखिलाते सर दर्द को मुट्ठी में दबा कर बैठी थी, वापस लौटी तो एक लिफाफा इंतज़ार में था. उस लिफाफे के इंतज़ार में मैं सुबह से थी, जानती थी,  इंट्यूशन हो गया था शायद की अच्छी खबर नहीं होगी लेकिन उम्मीद तो कंधे पे सवार रहती है न सो मुस्कुरा के लिफाफा खोला, कारण बताओ नोटिस था. कितने अजीब से होते हैं ये नोटिस, कारण बताओ, मैं अभी तक उन शब्दों में प्यार, अपनापन, हक़ जाने क्या-क्या तलाश रही हूँ लेकिन सब कुछ तो तिर्यक रेखा पे जा बैठा है. ये भी होना ही था.  इतने मसाइल हैं चलो एक और सही.  आंसू और ठहाके दोनों अन्दर की तरफ बहते रहते हैं जब मैं उस कारण बताओ नोटिस का जवाब लिखने की सोचती हूँ, कोई जवाब नहीं सूझता, इस नोटिस भेजने वाले पर मुझे बेहद यकीन है हालाँकि कोई वजह नहीं मेरे पास अपने इस यकीन की और न मैंने कभी परवाह की किसी वजह की. लोगों ने मुझे वजहें दी यकीन न करने की लेकिन तब मैंने बस मुस्कुराना ठीक समझा. हाथों में वो कागज़ ले कर देखती हूँ अजीब सी खुशबु आती है, और मैं हँस पड़ती हूँ खुद के बनाये इस भरम पर जिसे मैं बड़ी शिद्दत से बना के रखती हूँ. जीने के लिए भरम जरुरी होते हैं क्या? मुझे तो भरम हो रखा है जीने का.
                                                                                           क्यूँ नहीं मैं बाकी सबकी तरह हो सकती? अरे एक कारण बताओ नोटिस ही तो है अच्छा सा जवाब ड्राफ्ट करो, भेजो और चैन से सो जाओ. लेकिन ऐसा कर नहीं सकती , ऐसा हो नहीं सकता, एक छोटी सी बात में भी जाने क्या क्या तलाशती रहती हूँ, सब कहते हैं ऐसे मौकों पर फैक्ट्स एंड फिगर्स में बात करनी चाहिए जो मेरे बस का नहीं सो सच -झूठ से परे एक लाइन का जवाब भेज दिया. अब तो जो होगा सुबह ही होगा और इस रात की सुबह कभी तो होगी ही न.

 जिस दिन तुम मेरा दामन छोडो उस दिन इस उम्मीद की उँगली पकड जरुर ही अपने साथ ले जाना.




ईश्वर को भी लास्ट वार्निंग दे दी है सरप्राइज़ पार्टी के लिए....





उसने कहा था जब बिना लाग-लपेट के, बिना शब्दों को घुमाए  बोलती हूँ तो उसे सुनना अच्छा लगता है .............यकीन है मुझे इस बात पर




अब की बार जब दूँगी आवाज़
तो
जरुर ही रख देना कानो में मेरे
किसी अँधेरे कोने में
बचा कर रखा हुआ एक बहाना
नीली पड़ने के बावजूद भी
हिलने की हिम्मत रखने वाली
उँगलियों को बींध देना
ठंडी सवालिया नज़रों से
 नहीं है मेरे पास
एक भी कारण
की
संतुष्ट कर सकू तुम्हे
और बचा ले जाऊं
कुछ जिंदा रह गई चीज़ों के अवशेष,

तुम्हारे पास बचा हो शायद कोई बहाना
दस्तकों को सुनने या  अनसुना करने का
 ,



   

Tuesday, 17 February 2015


                                        इश्क....इश्क.....इश्क....                         







सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।



मधुशाला....मधुशाला... जब भी ये सुनती हूँ अपना पहला इश्क याद आता है. जैसे पहले एक जय साबुन का ऐड आता था  ..पहला प्यार.. लाये जीवन में बहार.. पहला प्यार.. कैसा अजीब सा गुदगुदी सा अहसास होता था टीवी पर ये ऐड देख कर. वैसे ही जब आज ये लाइन्स कानों में पड़ी तो याद आया अपना पहला प्यार. या यूँ कहना चाहिए की मुझे दो बार पहला प्यार हुआ, अब कौन सा पहला कौन सा दूसरा तय करना कठिन तो दोनों ही मेरे पहले प्यार ... शायद सातवीं क्लास में थी जब घर में मधुशाला पहली बार सुनी ... सुनी और डूबती गई... ये वो ज़माना था जब क्लास की लडकियां मिल्स एंड बूंस पढ़ती थी और उन खूबसूरत से ग्रीक देवों जैसे हीरो की चर्चा किया करती थीं. ऐसा नहीं की मैंने पढने की कोशिश नहीं की  लेकिन एक नावेल भी पूरा नहीं पढ़ पाई कभी. जब मधुशाला सुनी तो इन शब्दों के रचयिता के प्रेम में पड़ गई. पता नहीं क्यूँ मन्ना डे से इश्क नहीं हुआ.. इश्क हुआ तो शब्दों से और बेहिसाब हुआ. उसके बाद हरिवंश राय बच्चन को पढ़ा गया. उनकी कविता नीड़ का निर्माण फिर फिर को पढ़ कर जाने कितने इंटर स्कूल चैम्पियनशिप में ट्रॉफी जीती गई. शब्दों की इन गलियों में किसने ऊँगली पकड़ पहली बार सैर कराई थी याद नहीं . पापा के पास बहुत किताबें थी .. इंग्लिश नोवेल्स थे जो नाइन्थ क्लास तक आते आते सारे चाट डाले. इन नोवेल्स के इलावा  विष्णु प्रभाकर, शिवानी,  आशापूर्णा देवी, शरत चन्द्र, राजेंद्र बेदी, इस्मत चुगताई, मंटो,   और भी जाने कितने नाम जो नाइन्थ तक पढ़ डाले. फिर एक दिन किसी ने मेरे हाथों में अमृता प्रीतम की रसीदी टिकट रखी. लगा शब्दों को ऐसे भी संजोया जाता है? मन ऐसे भी कागज़ पर उतारा जाता है? हम किसी को कितना पसंद करते हैं शायद ये इस बात पर निर्भर करता है की हमने उनकी पहली आवाज़ कौन सी सुनी. अब तक शब्दों , भावों  की सीधी-सीधी  गलियों में घूम रही थी अचानक ही  तीखे मोड़ों, सीधी अतल  गहराई और चुभती सी चढ़ाई वाले रस्तों पर किसी ने ला खड़ा किया. यही समय था जब मैंने ग़ुलाम अली की" एक पगली मेरा नाम जो ले , घबराए भी शर्माए भी" और मेहँदी हसन की "मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो" सुनी, लेकिन पता नहीं क्यूँ न तोमुझे मोहसिन नकवी और न ही मसरूर अनवर से मुहब्बत हुई , हुई भी तो इन आवाज़ों के जादूगरों से हुई. ग़ुलाम अली को सुनो तो लगता है की कहीं बहुत बहुत  उतार ले जा रही है ये आवाज़. तो दूसरी तरफ मेहँदी हसन की आवाज़ आसमान के पार नीरवता में भिगो देती है. बेग़म अख्तर से परिचय भी इन्हीं दिनों हुआ था , उनको सुनो तो सीने में हुलक सी उठती थी. गोया ये के इश्क में डूबने को महबूब बेहिसाब थे और हमारे इश्क के चर्चे भी आम थे. अच्छा हुआ कभी किसी चेहरे की लगन में नहीं डूबी, पता नहीं, याद नहीं की कब कैसे रंगों में डूबी, रंग... रंग... उँगलियों से आती रंग की खुशबु.... हथेलियाँ रंगों से सरोबार... चेहरा .. कपड़े सब रंगों में लिपटे हुए... इतनी सी याद बची है की रंगों में डूबना सुकून बनता गया. तारपीन के तेल की महक किसी भी डियो की महक से ज्यादा अच्छी लगने लगी. आज भी जब अपनी दुनिया में पैर फैला के बैठने का मन होता है तो कैनवास और रंगों की ही पनाह में जाती हूँ.
                              जाने रंगों से ज्यादा मोहब्बत है या शब्दों और आवाजों के जादूगरों से ... कभी फैसला नहीं हुआ ... इसलिए दोनों से ही इश्क पहला इश्क हुआ. कौन ज्यादा सर चढ़ के बोलता है .... कौन ज्यादा गहरे तक पैठा हुआ है पता नहीं..
                                                                                    इश्क किया और डूब कर टूट कर किया, इन आवाजों ने , इन शब्दों ने,इन रंगों की खुशबुओं ने   इश्क की गहरी लू में तपती रेत पर तड़पना सिखाया जो आज तक मुसलसल जारी है. किसी चेहरे से शायद ऐसा जुनूनी इश्क नहीं कर पाती जो एक ख्याल से कर बैठी.... जब तक ये इश्क सलामत तब तक हम सलामत..



रोक सको तो पहली बारिश की बूँदों को तुम रोको
कच्ची मिट्टी तो महकेगी है मिट्टी की मजबूरी

Tuesday, 10 February 2015



तुम मेरे लिए ताबीज़ जैसे हो

और

मैं तुम्हारे लिए किसी राह की अजनबी राहगीर

तुम्हे होना ही था

और मैं ठहर कर क्या करती

हज़ार साल भी रहती तो भी

तुम्हारी राह मुझसे से ना मिल पाती
                                                  एक अदद दोस्त चाहिए.....








आज किसी से बात करने का जी चाह रहा है, असल में आज नहीं बल्कि पिछले कई दिनों से मन हो रहा है कोई मिल जाए और मैं अपना जी उड़ेल दूं. लेकिन ऐसा कहाँ हो पता है. जो सोचो वो तो बिलकुल नहीं हो पाता . किसी दोस्त के सामने  बैठ सब कुछ कहना या फिर फोन पे ही दिल खोलना कहाँ हो पता है मुमकिन. दोस्त हैं तो ज़ाहिर सी बात है मेरे दुःख पे दुखी हो जायेंगे, बस यही बात मुझे कुछ भी कहने से रोक लेती है. और देखा जाए तो दुःख भी नहीं है, शायद अपने कम्फर्ट जोंन से बाहर नहीं निकलना चाहती. ऐसे वक़्त में वो मेंढक वाली कहानी याद आ जाती है जो उबलते पानी से चाहना के बावजूद नहीं निकल पाता. कहानी कुछ यूँ है की एक मेंढक को कुछ वैज्ञानिकों ने एक आधे भरे हुए कांच के जार में डाल  दिया. वैज्ञानिकों ने अब पानी का टेम्प्रेचर बढ़ाना शुरू किया, पानी गर्म होता गया और मेंढक अपने आपको उस गर्म होते पानी के साथ एडजस्ट करने में लगा रहा. एक समय ऐसा आया जब उसने निर्णय लिया बाहर कूदने का लेकिन तब तक देर हो गई थी और वो अपनी सारी एनर्जी खर्च कर चूका था अपने आपको एडजस्ट करने में. कहीं ऐसा ही हाल मेरा भी न हो. परिस्थितियों से एडजस्ट करते करते कहीं मैं उस लॉन्च पैड को अनदेखा न कर दूं जो ज़िन्दगी मुझे दे रही है.

                                                                                    ज़िन्दगी बदलने वाली है, पूरी तरह बदलने वाली है, क्या इस बदलाव से भाग रही हूँ, या डर लग रहा है, कहना मुहाल है. क्या वाकई अकेलापन इतना त्रासद होता है की उससे डरा जाए. क्या करुँगी, कैसे रहूंगी जैसे सवाल इस इंतज़ार में मुँह बाए खड़े हैं की मैं उनके जवाब तलाश कर उन्हें दे दूं. लेकिन फिलहाल मेरे पास कोई जवाब नहीं. सिर्फ एक मूल मन्त्र है --"जो होता है अच्छे के लिए होता है", "जो होगा देखा जायेगा". कहना आसान है करना मुश्किल. किसी से मतलब किसी से भी भाई- भाभी माँ पापा कुछ नहीं कहा जा सकता, जब किसी का कोई इख्तियार नहीं तो बोलना क्यूँ. एक दोस्त कहता है की प्रकृति हमें तैयार करती है आने वाली ज़िन्दगी के लिए, शायद यही सच हो.  उससे इधर-उधर की ढेरों बातें की लेकिन चाह  कर भी उसे कुछ नहीं बता पाई. वो पूछता है दिल्ली कब आओगी, और मैं उसे एक महीने का नाम बता देती हूँ ये सोचते हुए की अभी झूठ बोल लो जब वो वक़्त आएगा तब देखा जाएगा.
       

                                                                                                      एक अदद दोस्त चाहिए जैसा विज्ञापन दे देती हूँ, ऐसा दोस्त जो अजनबी भी हो, जिसके आगे जब आँखें भर आये तो वो ना रोये, जिससे कुछ भी कहना और कह कर भूल जाना आसान हो.

एक कागज़ पे ढेर सारे नाम लिखे. उन्हें दोस्तों, रिश्तेदारों, परिचितों जैसी कैटेगिरी में बांटा. फिर पेंसिल चबाते हुए सोचा परिचितों के सामने दिल उड़ेलना जैसी बेवकूफी नहीं करनी चाहिए. रिश्तेदारों और दोस्तों के नाम भी एक एक कर कटते गए, कुछ को मेरी नहीं सुननी और कुछ को मैं अपनी सुना के दुखी नहीं करना चाहती, तो लो बचा  रह गया ख़ाली कागज़ और सारी परेशानियां मेरे पास. फ्यूचर पता नहीं क्या है फिर भी फ्यूचर प्लान कर रही हूँ रात-रात जाग के. खुली आँखों से सपने देखने जैसा मीठा कुछ नहीं होता. जहाँ मैं अपनी ज़िन्दगी रिवाइंड करती हूँ, कुछ पलों को जितनी बार मन करे उतनी बार जीती हूँ, सुखद फ्यूचर निहारती हूँ और एक दिन सब ठीक हो जाएगा कह कर आँखें मूँद सोने की कोशिश करती हूँ.

                                                                               ना पेंटिंग कर रही हूँ , ना लिख रही हूँ और ना ही कुछ पढने में मन लगा पा रही हूँ. स्कूल के  बच्चो,  जिनके एग्जाम सर पे हों, की तरह किताब खोल के गोद में रख लेती हूँ और आँखें पन्नों में बींध देती हूँ फिर भी कुछ नहीं दीखता. अलबत्ता वो सब जरुर याद आता है जो नहीं आना चाहिए. अजीब कैफियत हो चली है.

                                                      मजाज़ के इलावा और कौन  है जो सहारा दे सके

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ 
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ 
ग़ैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
                                                                               

Sunday, 18 January 2015

नहीं है प्रेम तुमसे
मैं नहीं हूँ तुम्हारे प्रेम में डूबी हुई
हाँ
लेकिन
जब देखती हूँ तुम्हे
तो नज़र में होता है उसका चेहरा
उसकी बातें , उसकी मुस्कान
तुम्हारी किसी बात पर जब खिलखिल कर उठती हूँ
तब वह होती है एक नैराश्य में डूबी खिलखिलाहट
कि
नहीं वो पास की भर सकु रंगों को मुठियों में
नहीं वो पास की डुबो सकूँ सारी उम्र को उसके रंगों में
सच ,नहीं है मुझे प्रेम तुमसे
किसी के कहने से भी नहीं है
बस
तुम्हारे नाम का बीच वाला अक्षर हु ब हु मिलता है उसके नाम के बीच वाले ही अक्षर से
शायद इसलिए थोडा सा लगाव हो उठा है तुमसे
लेकिन प्रेम तो सिर्फ उससे ही है ।