Thursday, 12 September 2013

उत्कंठा है
        तुम्हारे साथ
 खेलने की
हर किसी से जीत कर
    तुमसे हारने की
दाँव  पे रखूँगी
      अपने
   पाप -पुण्य
 धर्म -अधर्म
इक्षा -अनिक्षा
     "मैं"
और पा जाऊँगी
चिर -प्रतीक्षित  हार में
चिर -लक्षित जीत
     "तुम"

3 comments:

  1. पारिजात सा...कोमल...

    जब भी तुम उत्कंठित होती हो
    वो आह्लादित होता हूँ
    तुम हारकर अनमोल हो जाती हो
    वो जीतकर तुम्हारा हो जाता हूँ

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