Sunday, 15 September 2013



सारा कमरा घूम रहा था , लेकिन कमरे की

चीज़ें अपनी जगह थी , फर्श और अर्श एक

हुए जा रहे थे तब भी हम अपनी जगह से तिल मात्र भी खिसके नहीं थे आखिर चक्कर क्या था , कानो में अभी तक शताब्दी ट्रेन की सीटियाँ गूँज रही थीं ,

वही शताब्दी जो अभी - अभी हमारी बिटिया के एक जुमले की वजह से हमारे एक कान से धडधडाते हुए दूसरे कान से गुजर गई थी , अपने होशो- हवास को काबू में करते हुए कहा ----- "बेटा जी क्या कहा आपने"


बिटिया भी तो हमारी ही थीं

( करेला वो भी नीम चढ़ा)


बोलीं ---- " इस बार दिवाली पर मैं सलवार कमीज़ पहनूगी और दुपट्टा भी "

सुन कर हमारे तो सारे त्यौहार एक दिन में ही मन गए , उनका इरादा बदलने से पहले आनन् फानन में हम उन्हें बाज़ार ले गए .

दर्जी को जब नाप देने का वक़्त आया तो एक बार फिर से हम आकाश पाताल की सैर करने लगे , बिटिया ने फिर बड़ी बूढियों की तरह समझाया " माँ आजकल backless का फैशन है"




और दुपट्टा ? हम मिमियाए

जब बिटिया ने दुपट्टे का नाम लिया था तभी से हमें " हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का " ये गाना चारों तरफ सुनाई ही नहीं दिखाई भी दे रहा था , लेकिन दुपट्टे के नाम पे उनकी उस पतली सी पट्टी ने हमारे ख्वाबों की ऐसी धज्जियाँ उड़ाई की तौबा तौबा . हम सहम कर दूकान से बाहर आ गए की कहीं वो गुजर चुकी शताब्दी वापस हमारे कानो में आकर न खड़ी हो जाए ।


चुपचाप बिटिया को ले कर घर पहुंचे जो गर्मी- गर्मी रटे जा रही थीं , पता नहीं कैसे हैं ये बच्चे जो AC से बाहर निकलना ही नहीं चाहते और एक हम थे की अम्मा चिल्लाती रह जाती और हमें खेलने से फुर्सत न मिलती ।


उमस भरी दोपहर में हम सूरज से इतना कहते आ भाई थोड़ी देर के लिए आँख मिचौली खेल ले , थोड़ी गर्मी कम हो जाएगी लेकिन उन्हें तो लुत्फ आता था अम्मा से हमें डांट पडवाने में , अम्मा चिल्लाती ---सो जा मरी , सारा दिन धमा चौकड़ी , उछल कूद , लू लग जायेगी , गर्मी छुट्टियाँ हमेशा से ही हमारे लिए और अम्मा के लिए मुसीबत का बायस बनती थीं , चीख चीख कर अम्मा का गला बैठा रहता और बरफ के गोले खा- खा कर हमारा।


जब पूरे घर में सन्नाटा होता , दोपहर की ऊँघ का मक्खियाँ भी जब मज़े ले रही होती तब हम गली के लड़को की टोली में घुस दोपहर और छुट्टियों का सदुपयोग कर रहे होते ।

एक आँख मीच के और जीभ को गोल घुमाते हुए नाक और ऊपरी होंठ के बीच में टिका कर हम किसी कंचे पर निशाना साधे तो मज़ाल है की वो इधर उधर फुदक जाए , कंचे खेलने में अव्वल दर्जे की महारत हासिल थी हमें । एक और खेल जिसमे कोई हमारा मुकाबला नहीं कर पाता था, वो था साइकिल के पुराने टायर को डंडी से हांकना , जिसका टायर जितनी दूर चला वो जीता । यहाँ हम अपने लड़की होने का पूरा- पूरा फायदा उठाते थे , बाकी सबकी एक बाज़ी और हमारी दो , कोई ऐतराज़ करता तो हम बड़ी शराफत और मासूमियत से कहते - जरा दुपट्टा सँभालते हुए टायर चला कर दिखाए कोई , ये करतब तो सिर्फ हमी कर सकते हैं गोया दुपट्टा संभालना ना हुआ सर्कस का कोई खेल हो गया ।

हम टायर दौडाते हुए चले जा रहे थे , हमारी चप्पलें कब हमें अलविदा कह के चली गई हमें पता भी नहीं चला और किसी जौहरी को भी खुर्दबीन की जरुरत पड़ जाती हमारे बालों का रंग बताने के लिए ।

भगवान भी बड़े इत्मीनान से हमें टायर हांकते हुए देख रहे थे , एक पल सिर्फ एक पल को उनकी नज़र हमपे से क्या हटी की तूफ़ान ही आ गया ।

हम टायर के साथ दौड़े जा रहे थे और हमारे पीछे- पीछे दौड़ने में साथ दे रही थी हमारी टोली तभी बगल से एक गाडी गुज़री , पिताजी खिड़की से सर निकाल , नहीं शरीर के आधे हिस्से को सर कहना ठीक न होगा , लगभग खिड़की से लटके हुए भौंचक्के से अपनी प्यारी लाडो को पहचानने की कोशिश कर रहे थे ,गज़ब की फुर्ती दिखाते हुए हमने घूंघट किया , सच्ची पहली बार हमें इस घूँघट नाम की बला की अहमीयत पता चली फिर भी आज तक पता नहीं चला की उन्होंने हमें पहचाना कैसे ?

पेशी तो होनी ही थी , हुई भी , वो क्या बोल रहे थे कुछ पल्ले नहीं पड़ रहा था ( कान बंद करने की आदत तो हमें बचपन में ही लग गई थी) और वैसे भी हमारा पूरा ध्यान तो उनकी मूछों पे था , हम अपने ख्यालों में उनकी मूछों को बैंगनी रंग में रंग कर उसपे झूला डाल पींगे लेने की तैयारी कर ही रहे थे की हमारी बिटिया ने हमें बचपन से सीधा सच्चाई के धरातल पे ला खड़ा किया ।

एक ये बच्चे हैं इनके दोस्त भी इनकी ही तरह शांत , कोई हल्ला गुल्ला शोर शराबा नहीं , सब अपने अपने फोन पे बिजी , कभी समझ ही नहीं पाए की फोन को देख के मुस्कुराने में क्या मज़ा आता है । खेल भी खेलेंगे तो कुर्सी पे बैठे बैठे , भगवान् की ही समझ में आता होगा की कौन से स्कोर का कौन सा रिकॉर्ड रोज़ रोज़ तोडा जाता है।

वो कहकहे , वो आसमान से ऊँचा उड़ना

धरती को बाहों में समेटना

बगुलों पर सवारी करना

कहानियाँ , शैतानियाँ

पूड़ी अचार के चटखारे

काश

हमारे बच्चे भी

इनसे

थोड़ी पहचान बढ़ाते ।

13 comments:

  1. भाषा-शिल्प के स्तर पर यह प्रस्तुति प्रभावित करती है । कहीं-कहीं बनते दिखते नाटकीय-तत्वों के संयोजन तो प्रस्तुति को खास बना देते हैं |

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  2. शुक्रिया मुकेश जी

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  3. jab sunaate hain apne bachho ko apne bachpan ki kahani / to sochte hain kabhi kabhi tanhaayi mein / kya sunaayenge bachhe mere apne bachho ko bachpan ki shaitaani :)) umda kahani

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  4. शुक्रिया नीलिमा जी

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  5. वैसे अभी मेरी इतनी समझ नही की मैं किसी की रचना का आकलन कर सकू फिर भी बस इतना कहना चाहूँगा की इस रचना के बाद मैं आपका बहुत बड़ा प्रशंसक हो गया हूँ | आपकी लिखावट बेहद प्रभावी, आप छोटी छोटी बातो कर प्रस्तुतिकरन बेहद अलग ढंग से करती है | आपसे सीखने को बहुत कुछ मिलेगा |

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    1. आभार आपका राहुल जी

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  6. धरती को बाहों में समेटना
    बगुलों पर सवारी करना
    कहानियाँ , शैतानियाँ
    पूड़ी अचार के चटखारे
    काश
    हमारे बच्चे भी
    इनसे
    थोड़ी पहचान बढ़ाते ।
    waah...

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  7. ओह क्या क्या न याद करा दिया आपने , कितनी सरलता से उन गलियों में साइकिल की टायरों पर बिठा कर जाने कौन सी दुनिया की सैर करा दी आपने । कमाल की पोस्ट , साझा कर रहा हूं मित्रों के लिए

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  8. सुन्दर यादें समेटी हैं आपने बिटिया के बहाने...

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  9. चलचित्र सा लेखन ,अद्भुत ।

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